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Thursday, July 21, 2016

सरकार देश की अखंडता और एकता के लिए प्रतिबद्ध,आतंकियों की जिंदगी के लिए नहीं - वेंकैया नायडू



सरकार देश की अखंडता और एकता के लिए प्रतिबद्ध,आतंकियों की जिंदगी के लिए नहीं - वेंकैया नायडू






ऊना में जो कुछ हुआ वह पूरी तरह से निंदनीय है। इसलिए हमने तुरंत कार्रवाई भी की। : एम. वेंकैया नायडू
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कश्मीर में जनमत संग्रह की बात कभी नहीं कही। : वेंकैया नायडू
हमारी सरकार देश की अखंडता और एकता के लिए प्रतिबद्ध है, आतंकियों की जिंदगी के लिए नहीं। : वेंकैया नायडू
वेंकैया नायडू ने कांग्रेस पर कसा तंज। कहा, सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस को ज्ञानोदय हो गया है।
कांग्रेस कश्मीर मसले पर सिर्फ और सिर्फ राजनीति कर रही है। ऐसे लोग देश में अस्थिरता लाना चाहते हैं। : वेंकैया नायडू
पाकिस्तान लगातार भारत के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहा है। : वेंकैया नायडू
देशवासी जानना चाहते हैं कि हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान से आपकी इतनी सहानुभूति क्यों? : वेंकैया नायडू
बहुत से लोग और मीडिया हमें बुरहान वानी पर प्रवचन देते हैं। : वेंकैया नायडू
केंद्रीय मंत्री एम. वेंकैया नायडू संसद भवन परिसर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं।

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Monday, May 23, 2016

केरल, प. बंगाल में भाजपा/संघ सदस्यों पर हमले – ये राजनैतिक पार्टियां हैं या आतंकी संगठन ?


केरल, प. बंगाल में भाजपा/संघ सदस्यों पर हमले – ये राजनैतिक पार्टियां हैं या आतंकी संगठन ?



सिर्फ उत्तर भारत की पार्टी कही जाने वाली भाजपा ने पहले तो दक्षिण भारत में कर्नाटक में सरकार बनाकर अन्य सभी पार्टियों को चौंकाया, फिर लोकसभा चुनाव में भी असम, कर्नाटक में शानदार प्रदर्शन एवं प. बंगाल में सीट तथा केरल तमिलनाडु एवं नार्थ ईस्ट के कई राज्यों में अनदेखी ना की जाने वाले संख्या में वोट, फिर जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्, हरयाणा, झारखण्ड जैसे राज्यों में सरकार बनायीं और अब असम में अपनी दम पर इतने बड़े जनाधार से सरकार बनाई तथा प. बंगाल और केरल में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई और तमिलनाडु में सीट भले न हों लेकिन वोट मिलने शुरू हो गए हैं | मतलब यह कहना गलत नहीं होगा कि अब भाजपा भारत के हर हिस्से में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रही है |
भाजपा की इस बढ़ती उपस्थिति से कांग्रेस एवं क्षेत्रीय पार्टियों की नींद उड़ना स्वाभाविक है क्योंकि अब उनको उन राज्यों में भी भाजपा से लड़ना पड़ेगा जहां कि कुछ समय पहले तक भाजपा का कोई वजूद नहीं था | कुछ पार्टियों ने राजनैतिक हमले करके भाजपा से लड़ने की कोशिश की तो कुछ ने अब जानलेवा हमले करने शुरू कर दिए हैं | दिन रात गांधी जी का नाम लेकर अहिंसा का नाटक करने वाली पार्टिया सच्चाई में तो अब आतंवादी संगठनों की तरह दिखाई दे रहीं हैं | सिर्फ हमारा राज चले, लोग हमारी सही-गलत सब बात मानें और चुप रहें, जो विरोध में खड़ा हो उसे या तो जान से मार दो या फिर जानलेवा हमला कर के डराने की कोशिश करो – यही तो आतंकवाद है | अल कायदा, आई एस, बोको हराम आदि यही तो करते हैं | फिर क्या फर्क है इन राजनैतिक दलों एवं इन आतंकी संगठनों में ?
यदि ये पार्टियां खुद को राजनैतिक संगठन कहती हैं तो राजनैतिक तरीकों से पार्टी चलायें और अपने अच्छे कामों से विरोधियों का मुंह बंद कराएं | जानलेवा हमलों से क्या साबित करना चाहते हैं ? खैर अति हर चीज की बुरी होती है | यदि ये पार्टियां नहीं सुधरी तो कोई बड़ी बात नहीं होगी यदि अगले चुनावों में वहां भाजपा की सरकारें देखने मिलें |

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Saturday, May 14, 2016

भारत माता की जय बोलने पर वामपंथियों ने एक हिन्दू के मुँह में पेसाब किया, मीडिया चुप

भारत माता की जय बोलने पर वामपंथियों ने एक हिन्दू के मुँह में पेसाब किया, मीडिया चुप





वामपंथी आतंकवादियों ने त्रिपुरा के कमालपुर कॉलेज में भारत माता की जय बोलने पर एक हिन्दू छात्र को बुरी तरह 1 घंटे तक बाँध के मारा,
उसे घसीट कर कॉलेज के छात्र यूनियन कक्ष में ले गए
और उसके मुँह में पेसाब किया
ये सबकुछ वामपंथी छात्र संगठन SFI के आतंकवादियों ने किया
हिन्दू अलोक देब को पहले बांधा उनको पीटा, और फिर पेसाब किया
पेसाब करने के बाद वामपंथी आतंकवादियों ने नारे लगाये
"भारत माता की जय बोलकर इसका मुह गंदा हो गया था, अब हमने इसके मुह में पेसाब करके इसके मुह को साफ़ कर दिया"
त्रिपुरा में लेफ्ट की माणिक सरकार की सरकार है
अभीतक एक भी वामपंथी आतंकवादी के खिलाफ पुलिस ने कारवाही नहीं की है
देश की मीडिया इसपर एकदम चुप है, देश को बताया भी नहीं जा रहा

Wednesday, May 11, 2016

रोहित वेमुला मामले में कांग्रेस का बहुत बड़ा हाथ! ये बड़ा खुलासा जान चौंक जायेगे आप !

रोहित वेमुला मामले में कांग्रेस का बहुत बड़ा हाथ! ये बड़ा खुलासा जान चौंक जायेगे आप !



हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में चल रहे विवादों में बुधवार को एक और विवाद जुड़ गया। रोहित वेमुला की मौत के बाद यूनिवर्सिटी में आंदोलन के अगुआ रहे राजू साहू ने वामपंथी छात्र संगठन एसएफआई से नाता तोड़ लिया है। यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के महासचवि राजू साहू ने एसएफआई में लोकतंत्र न होने का आरोप लगाते हुए कहा कि यूनियन के पदाधिकारियों को अपने विचार व्यक्त करने तक की आजादी नहीं है और यहां तक कि साधारण कार्यकर्ता भी सीधे शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर बिना सवाल उठाए काम करते हैं।
राजू ने कहा कि अब मुझे समझ में आ गया है कि एसएफआई की राजनीति सिद्धांतों पर नहीं बल्कि अवसरवादिता पर आधारित है। राजू साहू ने रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद कैंपस में संगठन द्वारा की जा रही राजनीति से अपने मतभेद जाहिर करते हुए संगठन पर कुछ गंभीर आरोप भी लगाए। उन्होंने कहा कि रोहित की आत्महत्या के मसले पर चलाए जा रहे आंदोलन के लिए कांग्रेस फंड मुहैया करा रही है।



राजू साहू रोहित वेमुला के मामले में काफी सक्रिय रहे थे। रोहित को न्याय दिलाने के लिए होने वाले प्रदर्शनों में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। बुधवार को उन्होंने मीडिया को वामपंथी छात्र संगठन SFI की सदस्यता छोड़ने की घोषणा की। हालांकि, इसके बाद भी वह छात्र संघ के महासचिव बने रहेंगे। उन्होंने पार्टी पर गलत नीतियों को बढ़ाने का आरोप लगाया। साथ ही यह भी कहा कि वह इन दिनों रोहित की तरह ही खुद को बहुत अकेला महसूस करने लगे हैं।
साहू ने पार्टी छोड़ने के अपने फैसले के बारे में कहा, ‘मैं अपनी समझ के आधार पर कह सकता हूं कि रोहित के लिए शुरू किए गए आंदोलन को बड़े पैमाने पर कांग्रेस द्वारा फंड दिया जा रहा है। कैंपस के बाहर के कुछ लोग जिनमें राजनीतिक दलों के लोग भी शामिल हैं की इस विवाद को बढ़ाने में बड़ी भूमिका है।’


एसएफआई और जॉइंट ऐक्शन कमिटी फॉर सोशल जस्टिस के लिए अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए राजू साहू ने कहा, ‘रोहित वेमुला आंदोलन के लिए छात्रों के भविष्य को दांव पर लगाया जा रहा है।’ उन्होंने कहा कि इन सबकी वजह से वह बेहद अकेले हो गए हैं और तनाव में रहने लगे हैं। साहू ने कहा, ‘अकेलेपन और तनाव की वजह से मैं उसी रास्ते पर जाने के बारे में सोचने लगा हूं, जिस पर रोहित चला गया था।’ राजू ने कहा, ‘मुझे लगता है कि गलत रास्ते से खुद को दूर रखकर और थोड़ा बाहर निकलकर अपने को इन सबसे बचा सकता हूं।’
साहू ने संगठन छोड़ने के कई कारण बताए। उन्होंने पार्टी की अवसरवादी राजनीति और कुछ लोगों के खिलाफ झूठा प्रचार करने की नीति को भी पार्टी छोड़ने की वजह बताई। साथ ही यह भी आरोप लगाया कि एसएफआई के अप्रासंगिक आंदोलनों की वजह से छात्रों को अच्छे अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। साहू ने कहा, ‘छात्र संघ चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन में क्लास, जाति, और धार्मिक कार्ड खेला जा रहा है। एसएफआई की आंतरिक राजनीति में भी क्षेत्रीयता और धर्म बड़ी भूमिका निभाते हैं।’

Friday, May 6, 2016

देश मे सूखे की वजह बढता हुआ Secularism है। आप को लगेगा अजीब बकवास है तो पढिये...!


देश मे सूखे की वजह बढता हुआ  Secularism है।



देश मे सूखे की वजह बढता हुआ  Secularism है।
आप को लगेगा अजीब बकवास है, किन्तु यही
अटल सत्य है.. सेकुलरता के चक्कर मे पिछले 68
सालो मे हिन्दुत्व के प्रतीको को खत्म किया
गया। जिसमे पीपल, बड और नीम के पेडो को
सरकारी स्तर पर लगाना बन्द किया गया।
पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100%
आब्जरबर है, बड 80% और नीम 75 % है, अब चूँकि
हिन्दू धर्म मान्यता अनुसार हिन्दू समाज इन
पेडो पर जल चढाते है, पूजा करते है, इसलिए
सरकार ने तथाकथित कुछ लोगो को खुश करने
के चक्कर मे इन पेडो से दूरी बना ली तथा इसके
बदले यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया जो
जमीन को जल विहीन कर देता है। इस पेड को
लगाना इंदिरा गांधी ने चालू किया.. आज हर
जगह यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य सजावटी
पेडो ने ले ली। अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही
नही रहेगा तो गर्मी तो बढेगी ही और जब
गर्मी बढेगी तो जल भाप बनकर उडेगा ही।
आज दिल्ली मे इतना प्रदूषण है मेरा चैलेंज है..
अगर केजरीवाल सरकार ओड-इवन की नोटंकी
की जगह केंद्र सरकार के (सहयोग से) साथ
मिलकर हर 500 मीटर की दूरी पर एक पीपल
का पेड लगाये तो आने वाले कुछ साल भर बाद
प्रदूषण मुक्त दिल्ली होगी। वैसे आपको एक और
जानकारी दे दी जाए.. जब सोमनाथ चटर्जी
लोकसभा अध्यक्ष थे तब मंत्रियो और सांसदो
के आवास के अंदर से सभी नीम और पीपल के पेड़
कटवा दिए थे। कम्युनिस्ट कितने मानसिक रूप से
पिछडे है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा
सकता है कि तब लोकसभाध्यक्ष पीपल और
नीम के पेड कटवाने का कारण बताये थे कि इन
पेडो पर भूत निवास करते है। मिडिया मे बडा
मुद्दा नही बना, क्योंकि यह पेड हिन्दू
धार्मिक आस्था के प्रतीक थे। अब करने योग्य
कार्य..
इन जीवनदायी पेडो को ज्यादा से ज्यादा
लगाये तथा यूकेलिप्टस पर बैन लगाया जाय..
जिसके पास इतनी जगह न हो वह तुलसी जी
का पौधा लगाये। आइये हमसब मिलकर अपने
"हिन्दुस्तान" को प्राकृतिक आपदाओ से
बचाये.. अब आप समझ गए होगें की सूखे की वजह
देश का "Secularism" है..
शेयर कर सकते हो....

Tuesday, May 3, 2016

2014 में अगर कांग्रेस फिर आ जाती तो 2016 में ये हो जाता हिन्दुओ का हाल !

2014 में अगर कांग्रेस फिर आ जाती तो 2016 में ये हो जाता हिन्दुओ का हाल !

UPA 2 सरकार देश में एक ख़ास बिल ला रही थी जिसका नाम कुछ "सांप्रदयिकता विरोधी कानून" था जिसे सोनिया गांधी व् उसके मंत्री खुद ड्राफ्ट कर रहे थे


उस कानून में क्या क्या नियम थे जरा वो देख लें, अगर कांग्रेस सत्ता में आ जाती 2014 में तो आज 2016 में हिन्दुओ के साथ ये सब हो रहा होता


* अगर हिन्दू महिला का बलात्कार दंगे में हो जाये तो उस बलात्कार के लिए मुस्लिम को दोषी नहीं माना जायेगा, बलात्कार का केस भी नहीं होगा


* हिन्दू को कोई भी पूजा पाठ, घर में भी करना हो तो इलाके के अल्पसंख्यको से आज्ञा लेकर करना होगा
* दंगा हुआ तो उसके लिए दोषि केवल हिन्दू को माना जायेगा और उसपर केस किया जायेगा


* अगर मुस्लिम कोई भी केस हिन्दू पर करेगा तो उसकी सुनवाई केवल विशेष अदालत में होगी जिसमे 7 जज होंगे, 4 मुस्लिम तथा 3 अन्य वामपंथी


* बलात्कार की शिकार हिन्दू महिला थाने में शिकायत भी नहीं कर सकेगी, अन्यथा उसी पर घृणा फ़ैलाने का केस दर्ज कर लिया जायेगा


* 100 किलोमीटर दूर कोई भी मुस्लिम आप पर केस कर दे, चाहे वो आपको जनता भी ना हो, आप पर केस बन जायेगा और आपको अदालत में खुद को बेकसूर साबित करना होगा।


इस तरह की कई और भी धाराएं कांग्रेस ला रही थी
इनको ड्राफ्ट करने वालो में सोनिया गांधी, चिदंबरम, कपिल सिब्बल, सुशिल शिंदे, JNU के प्रोफेसर और कई अन्य बुद्धिजीवी थे।

Thursday, March 10, 2016

कामरेड कन्हैया कुमार; तुम्हारी उम्र क्या है ?

हाँ तो कामरेड कन्हैया कुमार;  तुम्हारी उम्र क्या है ?
यही कोई 30-31 साल ना और तुमने क्या कहा की "भारतीय सेना कश्मीर में रेप करती है ।
चलो मैं तुम्हे एक जगह ले चलता हू " आज से ठीक 15 साल 6 महीने 9 दिन पहले 29 June 1999 की रात जब तुम JNU के अपने हॉस्टल में गांजे और सिगरेट के धुंए के बीच विदेशी शराब के घूंट हलक से नीचे उतार क्रांति की बातें कर रहे थे उस वक्त Dras, kargil, Jammu & kashmir में Captain Vijayant Thapar शहीद हो गए थे ।
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जानते हो उस वक्त उम्र क्या थी उनकी ? मात्र २२ साल !
‪#‎तोलोलिंग‬ को कारगिल का निर्णायक मोड़ माना जाता है और Major Mohit Saxena की
assault team में शामिल विजयंत की प्लाटून ने पाकिस्तान के ‪#‎बरबाद_बंकर‬ पर तिरंगा फहराया ।
तोलोलिंग को जितना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था, 2nd राजपूताना राईफल्स 1.5 महीने से लगातार असफल हो रही थी ।
ज्यादातर जवान और अधिकारी घायल थे और जब आदेश आया की अगर तुमसे नहीं होता तो खाली करो हम दूसरी रेजिमेंट भेजेंगे तब Commanding officer Col. M. B. Ravindranathan बोले की "राजपूताना की इज्ज़त का सवाल है ।
" बस 11 घंटे में तोलोलिंग पर तिरंगा था । that's the spirit of Indian Army, you bloody bastard.
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तोलोलिंग के बाद 2nd Rajputana को अगला task मिला three pimples & knoll को कब्जे में लेने का ।
जानते हो तोलोलिंग और टाईगर हिल के बीच sandwich की तरह फंसी काले पत्थरों की उबड़-खाबड़ भद्दी सी पहाड़ी हैं ।
29 जून की वो पूर्णिमा की रात थी, Northern light infantry (पाकिस्तान) की 6 वीं बटालियन चोटी पर 100 MM की gun और machine gun लेकर पूरी तैयारी से बैठी थी ।
चांदनी के उजाले में बेहद संकरे रास्ता, दोनो ओर करीब 15000 फीट की खड़ी ढाल, सामने से बचाव के लिए कोई ओट नहीं , केवल छोटी - छोटी चट्टानें जिस पर तुर्रा ये की तापमान -15℃ । साक्षात यमराज से भिड़ जाने सा था
यहाँ पर विजयंत की यूनिट ने असाल्ट शुरू किया कम्पनी कमांडर Major Padmpani Achary
के under में । जैसे ही चढ़ाई पूरी हुई दुश्मन ने मशीन गनों का मुंह खोल दिया और 100MM की
गोलाबारी शुरू हो गई । इसका बराबरी का जवाब दिया गया लेकिन नुकसान अपने ही पक्ष का ज्यादा हुआ ।
कुछ ही देर की मुठभेड़ में कंपनी कमांडर शहीद हो गए,ज्यादातर जवान या तो मर चुके थे या बुरी तरह जख्मी थे और इस निर्णायक घड़ी में विजयंत ने दुश्मन से सीधा सामना किया ।
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मात्र 15 मीटर की दूरी पर दो लाईट मशीन गनों के बीच आगे बढ़ कर मोर्चा लेना भारतीय सेना ही कर सकती है कन्हैया कुमार तुम्हारे जैसे किसी वामपंथी,गद्दार,नामर्द, नपुंसक & क्लीव के बस का नहीं जो 4 दिन जेल में रहकर खुद ही थूक कर चाट आये ।
कलेजा चाहिए होता है इसके लिए । समझे !
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मात्र 15 मीटर की दूरी से विजयंत को गोलियां बींध गईं थी; सीने , पेट और सिर में ........और वह रक्तरंजित नायक अपने साथी ‪#‎नायक_तिलक_सिंह‬ की बाहों में गिरा ।
जानते हो केवल 6 महीने हुए थे उसे सेना में भर्ती हुए और जब उन्हें ‪#‎वीर_चक्र‬ से सम्मानित किया गया तो पुरुष्कार लेने आईं थी उनकी 82 साल की वृद्धा दादी ।
उस बुढ़िया से पूछना उनकी छातियों में दूध उतार आया होगा उस वक्त ।
Greater Noida में उनकी अंतिम यात्रा में करीब 1.5 लाख की भीड़ उमड़ आई थी । .
और हाँ विजयंत केवल इसीलिए नहीं याद किये जाते एक 6 साल की बच्ची थी ‪#‎रुखसाना‬; आतंकियों ने हत्या की थी उसके परिवार की और इसी सदमें से उसकी आवाज चली गई थी ।
मात्र 5 महीने में ही उसकी आवाज लौट आई थी ।
जानते हो किसकी वजह से ??
विजयंत थापर की वजह से और सुनो कारगिल पर दुश्मनों के हमले के बाद, शायद अपनी आने वाली मौत को भांपते हुए कैप्टन विजयंत ने अपने परिवारवालों के नाम एक चिट्ठी लिखी थी। जिसमें उन्होंने लिखा कि, 'जब तक ये चिट्ठी आप लोगों तक पहुंचेगी, शायद मैं न रहूं। मेरे मरणोपरांत अनाथालय में कुछ रुपए दान करें, और रूखसाना को 50 रूपए प्रति माह भेजते रहें।' रूखसाना पांच वर्षीय बच्ची थी, जो कैप्टन के साथ खेला करती थी और उसे विजयंत से काफी स्नेह था।
विजयंत थापर के पिता कर्नल वी एन थापर ने भी भारतीय सेना में रहकर 37 वर्ष तक देश की सेवा की। पिछले १७ बारह साल से लगातार सैकड़ों मील की दूरी तय कर वह उस उजड़ी और सुनसान जगह पर जाते हैं जहां उनका बेटा दुश्मनों से लोहा लेते हुए खेत हो गया था। वह ऐसा सिर्फ अपने शहीद बेटे को याद करने के लिए नहीं बल्कि उससे किए गए एक वादे को पूरा करने के लिए भी करते हैं। अपनी इस मूक श्रद्धांजलि के द्वारा सेवानिवृत्त कर्नल वीएन थापर कारगिल युद्ध में शहीद हुए अपने बहादुर बेटे कैप्टन विजयंत थापर से किए गए उस वादे को पूरा करते हैं जिसमें उनके बेटे ने जीवन के अंतिम क्षणों में कहा था कि अगर हो सके तो वह उस जगह आकर देखें जहां भारतीय सेना उनके और देश के भविष्य के लिए लड़ रही है।
कन्हैया तुम और तुम्हारे साथी स्त्री देह के भूखे, बच्चों के मांस को भून कर खा जाने वाली विचारधारा के झंडा बरदार क्या जानो की भावनाएं क्या होती हैं । .
तुम्हारा आदर्श होगा वह झूठा, कायर, मानसिक दलित और भगोड़ा ‪#‎रोहित_वेमुला‬ पर हमें अभिमान है शहीद ‪#‎विजयंत_थापर‬ पर ; हमारा आदर्श कोई भारत को बांटने वाला वामपंथी कुत्ता नहीं बल्की वो 13 लाख की शत्रुहंता और मानवता की सेवक हमारी सेना है।
सुन वामपंथी कुत्ते - शहीद चमकते हैं , शहीद दमकते है , चेहरे याद नहीं हैं , फिर भी वो महकते हैं , लोग तो रोज मरते हैं....पर वो मर कर भी जी जाते हैं...क्योंकि वो शहीद कहलाते है...

जय हिन्द जय हिन्द की सेना...!!.

जानिए मकबूल भट कौन था ?

देश की राजनीति में थोड़ी भी रूचि रखने वाले या थोड़ा सामान्य ज्ञान रखने वाले सब अफज़ल गुरु के बारे में जानते हैं, लेकिन JNU में अफज़ल गुरु के साथ जिस मकबूल भट को शहीद कहकर नारे लगाये गए... उस मकबूल बट के बारे में आज की युवा पीढ़ी शायद ही जानती हो.
जानिए मकबूल भट कौन था, और उसने क्या किया था जिसके कारण उसको फांसी दी गई.....
पुणे मे हर दिन हजारों वाहन म्हात्रे पुल से गुजरते हैं. लेकिन उनमें से शायद 10% लोग भी नही जानते होंगे कि ये म्हात्रे कौन थे.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मे कुछ बुद्धिजीवियों ने कुछ दिन पहले प्रदर्शन किये और अफजल गुरु और मकबूल बट को शहीद कहकर घोषणाएं की. मकबूल भट को सामान्य जनता भूली होगी मगर ऊग्रवादी भूले नही. कश्मीर घाटी के पुराने हिंन्दू जो भट्ट थे वही धर्मपरिवर्तन के बाद भट हो गये थे.
14 सितंबर 1966 को पाकिस्तान की सहायता से इस मकबूल भट ने पुलिस बल पर हमला किया जिसमे इंन्स्पेक्टर अमरचंद मारे गए. 1971 के विमान अपहरण कर लाहौर ले जाने में भी इस मकबूल भट की मुख्य भूमिका थी. तब यह पाकिस्तान में रहता था.
1976 में भारतीय सेना ने पकड़ा और फिर इसे फांसी की सजा हुई. उसने भारत के राष्ट्रपति से क्षमा याचना की.
3 फरवरी 1984 को इसके साथियों (Jammu Kashmir Liberation Front) ने लंडन मे भारतीय उच्चायोग के श्री रवींद्र म्हात्रे का अपहरण किया. श्री म्हात्रे अपनी छोटी सी बेटी के जन्मदिन का केक लेकर घर आ रहे थे और बस से उतरे थे. यहीं से अपहरण कर आतंकियों ने मकबूल भट को रिहा करने की मांग की.
तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने यह मांग नहीं मानी और स्पष्ट कर दिया कि भारत सरकार आतंकियों से कोई बातचीतनहीं करेगी. तब 6 फरवरी 1984 को इन आतंकियों ने श्री म्हात्रे का कत्ल कर उनके शव को सड़क पर फेंक दिया.
तब श्रीमती इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति श्री झैलसिंग को दया याचना को नामंजूर करने की सिफारिश कर 5 दिन बाद 11 फरवरी 1984 को मकबूल भट को फांसी पर चढ़ा दिया.
रवींद्र म्हात्रे के बूढे माता-पिता मुंबई के विक्रोळी मे 3 कमरे के मकान मे रहते थे. श्रीमती गांधी उन्हे मिलने मुंबई गईं और हवाई अड्डे से सीधे विक्रोळी गईं. म्हात्रे के बूढे पिता का हाथ 15 मिनट हाथ में लेकर बैठीं और सांत्वना दी. दोनो की आंखों में पानी था. श्रीमती गांधी ने देश को महत्व दिया था जिससे म्हात्रे को जान गंवानी पड़ी इसके लिये खुद को दोषी मानकर क्षमा मांगी और सीधे हवाई अड्डे से दिल्ली वापस आईं.
4 नवंबर 1984 को इन्ही आतंकियों ने मकबूल भट को फांसी की सजा देने वाले जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी.
ये JNU आतंकवादी 30 साल बाद अभी भी मकबूल भट को भूले नहीं मगर हम श्री रवींद्र म्हात्रे को भूल गए.

Sunday, March 6, 2016

रोहित वेमुला : एक हार हुआ नौजवान जिसने आत्महत्या कर ली थी, और शर्मनाक बात ये है कि हमारे देश का मीडिया उसे हीरो बना रहा है,

कन्हैय्या कुमार का बाप पैरालाइज़्ड है और कई सालों से बिस्तर पर है, माँ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता है जहाँ उसे 3000 रूपये महीने की तनख्वाह मिलती है, एक भाई और है जो आईएएस की तैयारी कर रहा है। कन्हैया कुमार की उम्र लगभग 30 वर्ष है और वो जेएनयू में पीएचडी कर रहा है। कन्हैया कुमार बिहार के जिस इलाके का रहने वाला है वो बहुत पिछड़ा इलाका है और वहां हमेशा सीपीआई और सीपीआई माले का बोलबाला रहा है। अब सवाल ये उठता है कि जिस बेटे की माँ दिन रात मेहनत करके 3000 रूपये महीने कमाती हो उसका लड़का 30 साल की उम्र तक पढाई करेगा? दूसरा सवाल, जिसके क्षेत्र का विकास कम्युनिस्टों के रहते (या उनके कारण) नहीं हो पाया क्या वो उन्ही का फेवर करेगा? तीसरा सवाल, क्या एक गरीब दलित इतने महंगे वकील हायर कर सकेगा? और मजे की बात सुनिए, जिस लड़के को घर में इतनी परेशानियां हैं उसका आदर्श है, एक हार हुआ नौजवान जिसने आत्महत्या कर ली थी, और शर्मनाक बात ये है कि हमारे देश का मीडिया उसे हीरो बना रहा है, रविश कुमार जैसे सीरियस पत्रकार उसकी शान में कसीदे पढ़ रहे हैं।

Saturday, March 5, 2016

गिरगिट हिन्दू और मकड़ी मुसलमान

गिरगिट हिन्दू और मकड़ी मुसलमान
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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी को "तोजो का कुत्ता" कहने वाले, 1962 में भारत-चीन युद्ध में चीन का साथ देने वाले, बंगाल जैसे संपन्न राज्य को अपने दशकों के शासन में गरीबी-भुखमरी-बेरोजगारी के नरक में झोंकने वाले नीच बामपंथीयों को "जिहादी नक्सल यूनिवर्सिटी" में विकास -आजादी और देशभक्ति का प्रोपगेंडा करते देख यह मशहूर किस्सा याद आया।
इन्ही लाल चड्डी गैंग की तरह मदरसों में भी मासूम बच्चों का "माईंडवाश" किया जाता है, यह बचपन का किस्सा भी उसी की एक बानगी है। दरअसल मदरसे में मौलाना साहेब हमें "कर्बला जंग" के बारे में बता रहे थे। कर्बला के जंग में इमाम हुसैन साहब "हिन्दुओं की फ़ौज" से अपने परिवार और बच्चों के साथ जान बचाने के लिए एक सूखे कुँवें में छिप जाते हैं।
तभी अल्लाह अपने बन्दों की रक्षा के लिए एक फरिश्ता भेजता है, जो मकड़ी के रूप में आकर उसे कुँवे को जाले से कुछ इस तरह ढँक देता है, जिससे से की कुँवे के अंदर झाँकने से बाहर वालों को कुछ दिखाई न दे।
लेकिन तभी हिन्दुओं के देवता ने गिरगिट के वेश में आकर कुँवे के मुंडेर पर बैठ "हिन्दुओं के फ़ौज" को बार-बार सर हिलाकर हुसैन साहब के अंदर छिपे होने का इशारा कर देता है। हिन्दुओं की फ़ौज जाले को हटाती है और हुसैन साहब को कुनबे समेत क़त्ल कर देती है। किस्सा सुनकर बच्चे "हाय हुसैन" करने लगे और हिन्दुओं के लिए लानत बरसाने लगे।
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जब की हकीकत यह है की --- इमाम अली साहेब और उनके बेटे हसन और हुसैन के साथ अन्याय शुरुआत से ही इन्ही सुन्नियों ने किया। मुआविया और उसके बेटे यजीद सुन्नी खलीफा अबु-बकर, उमर और उस्मान की मदद से ही इस कुकृत्य को अन्जाम देने में सफल हुए थे। और फाइनली निहत्थे इमाम हुसैन साहब की कुनबे सहित "कर्बला" में जघन्य हत्या कर दी गयी। शिम्र नामके व्यक्ति ने इमाम हुसैन का सर काट कर उनको शहीद कर दिया , शिम्र बनू उमैय्या का कमांडर था। उसका पूरा नाम "Shimr Ibn Thil-Jawshan Ibn Rabiah Al Kalbi (also called Al Kilabi (Arabic: شمر بن ذي الجوشن بن ربيعة الكلبي) था।
दूसरी बात भारतीय हिंदुओं में एक परिवार या समुदाय "हुसैनी ब्राह्मण" कहलाता है, हुसैनी ब्राह्मण दरदना भट्टाचार्य के वंशज थे. उनमें आत्माभिमान, बहादुरी, और रहमत कूट-कूट कर भरी थी, वे इमाम अली साहब और उनके परिवार के प्रति सम्मान और आस्था रखते थे। कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत की खबर सुनी तो हुसैनी ब्राह्मण रिखब दत्त इराक पहुंचे।
यजीद के सैनिक इमाम हुसैन के शरीर को मैदान में छोड़कर चले गए थे। तब रिखब दत्त ने इमाम के सर को अपने पास छुपा लिया था। यूरोपी इतिहासकार रिखब दत्त के पुत्रों के नाम इसप्रकार बताते हैं ,1 सहस राय ,2हर जस राय 3,शेर राय ,4राम सिंह ,5राय पुन ,6गभरा और7 पुन्ना। बाद में जब यजीद को पता चला तो उसके लोग इमाम हुसैन का सर खोजने लगे कि यजीद को दिखा कर इनाम हासिल कर सकें। जब रिखब दत्त ने सर का पता नहीं दिया तो यजीद के सैनिक एक एक करके रिखब दत्त के पुत्रों से सर काटने लगे ,फिर भी रिखब दत्त ने पता नहीं दिया। सिर्फ एक लड़का बच पाया था। जब बाद में मुख़्तार ने इमाम के क़त्ल का बदला ले लिया था तब विधि पूर्वक इमाम हुसैन के सर को दफनाया गया।
रिखब दत्त के इस बलिदान के कारण उसे सुल्तान की उपाधि दी गयी थी और उसके बारे में "जंग नामा इमाम हुसैन " के पेज 122 में यह लिखा हुआ है ,"वाह दत्त सुल्तान ,हिन्दू का धर्म मुसलमान का इमान,आज भी रिखब दत्त के वंशज भारत के अलावा इराक और कुवैत में भी रहते हैं ,और इराक में जिस जगह यह लोग रहते है उस जगह को आज भी हिंदिया कहते हैं।
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जिस रसूल के नाम का कलमा पढ़ा, उसी के नवासे को परिवार सहित निर्दयता से क़त्ल कर उसका दोष निर्दोष हिन्दुओं पर मढ़ने वाले सुन्नियों और नीच बामपंथियों का प्रोपगेंडा फ़ैलाने में महारथ हासिल है

CPM यानी तानाशाही-वो भी एक छोटी सी यूनिवर्सिटी में

साल 2012 की बात है। ‪‎JNU‬ में SFI‬ के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार वी.लेनिन कुमार ने राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस की तरफ से प्रणब मुखर्जी की दावेदारी को सीपीएम का समर्थन देने पर विरोध जताया था। अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार सीताराम येचुरी और प्रकाश करात की सीपीएम ने बिना देर किए लेनिन कुमार और चार साथियों को न केवल एसएफआई से बाहर कर दिया बल्कि जेएनयू की एसएफआई यूनिट ही बर्खास्त कर दी। लेनिन कुमार ने एसएफआई-जेएनयू बनाई और चुनाव लड़ा। लेनिन कुमार चुनाव जीत गया। और असल एसएफआई का उम्मीदवार 10वें नंबर पर रहा और उसे 4309 में से सिर्फ 107 वोट मिले। तो ये थी असल एसएफआई की कैंपस में हैसियत और कद लेनिन का बड़ा था। उस वक्त बकौल इंडियनएक्सप्रेस लेनिन ने कहा था-
"fundamental problem with the CPM-SFI" is that the combine now functions like a "dictatorship" with "no room for debate" and represents all that is "unprincipled and undemocratic".
यानी तानाशाही-वो भी एक छोटी सी यूनिवर्सिटी में। लेकिन सवाल लेनिन की जीत का नहीं, सवाल यह कि प्रणव मुखर्जी की दावेदारी का विरोध भर करने पर सीपीएम ने अपने छात्र नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया और वो अभिव्यक्ति की आजादी की बात कर रहे हैं। और सवाल यह भी है कि लेनिन समेत तमाम एसएफआई छात्र नेता प्रणव मुखर्जी को उस वक्त 'दलाल' और कांग्रेस को दलालों, भ्रष्टाचारियों और दलितों-गरीबों को लूटने वालों की पार्टी मानते थे (लेनिन का भाषण सुन लीजिए) लेकिन अब वही कांग्रेस वोट बैंक के लिए लेफ्ट की गोद मे बैठने को तैयार है और लेफ्ट को कांग्रेस में कोई बुराई नहीं दिख रही।
जो कन्हैया अब लेफ्ट पार्टियों का प्रचार करने को तैयार है, वो जेएनयू चुनाव के वक्त लेफ्ट के बाकी धड़ों से भी आजादी चाह रहा था। यकीं न तो उस वक्त के उसके भाषण सुन लीजिए(क्विंट पर बाइट है)। फिर एक सवाल ये भी जेहन में है कि क्या जेएनयू का लेफ्ट एबीवीपी से घबराया हुआु हैं क्योंकि बीते छात्र संघ चुनाव में 14 साल बाद एबीवीपी का एक कैंडिडेट सेंट्रल पैनल में पहुंचा। उपाध्यक्ष पद पर भी एबीवीपी कैंडिडेट दूसरे नंबर पर रहा। महासचिव पर भी एबीवीपी कैंडिडेट दूसरे नंबर पर रहा। यानी लेफ्ट के जितने धड़े जेएनयू में सक्रिय हैं-छात्रों का भरोसा उनसे उठ रहा है।
खैर, लेफ्ट को नया नेता मिल गया है। कॉमरेड कन्हैया अब लेफ्ट को तारेगा तो अच्छा है। लेकिन, अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल बुलंद करे तो फिर लेनिन को बाहर करने का सवाल भी उठेगा ही और उठना भी चाहिए। जो पार्टी अपने छात्र नेताओं को असहमति का हक नहीं देती-वो कैसे अभिव्यक्ति की आजादी की बात करती है। लेनिन का भाषण भी सुन लीजिए।

Friday, March 4, 2016

वामपंथियों के बारे में बाबा साहेब अंबेडकर के विचार

वामपंथ की छात्र राजनीति जब अपने मंचों से देश की भलाई की बात करती है तो बड़ी सुहावनी लगती है। विद्यार्थी कन्हैया भी समानता वाले समाज की सोच रखता है। गरीबों की भलाई की बात करता है। लेकिन जब भी वामपंथियों को शासन की बागडोर मिली है उन्होंने स्टालिन को दोहराने की कोशिश की है। प्रतिरोध की आवाज उठाने वाले हर गले को रेत दिया है। अभिव्यक्ति की आजादी मांगने वालों ने अपने खिलाफ उठे हर सुर को दबा दिया है। पश्चिम बंगाल का इतिहास तो यही बताता है। 35 साल लेफ्ट पार्टियों ने पश्चिम बंगाल पर शासन किया...और बंगाल की धरती को खून से सान दिया...जरा आंकड़ों पर नजर डालिए...
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2009 में पश्चिम बंगाल की विधानसभा में उस समय के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने खुद बयान दिया था...साल 2009 में 2284 हत्याए हुईं...26 राजनीतिक हत्याएं हुईं...माओवादी गतिविधियों में 134 लोग मारे गए...
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इस बयान के बाद दैनिक स्टेट्समैन कोलकाता में, 16 जुलाई, 2010 को छपी रिपोर्ट पढ़िए..
''A comment on the veracity of these figures is necessary. He has shown political murder as only 26. This figure is suspect. Between 1977 and 1996, the rate of annual political murder on an average was 1473. This figure, giving a 19-year-old trend, cannot suddenly come down to 26. This is a statistical outlier which has to be ignored. In 1997, Buddhadeb Bhattacharjee was severely criticised for admitting such a large figure of political murders. Hence a cautious Home Minister just manipulated the figure which has to be rejected as an outlier.
Anyway to come to a reliable figure of murders between 1997 and 2009, we have taken the annual average of 2284 to come to a total figure of 27,408. Thus between 1977 and 2009 the total number of murder was 28,000 + 27,408 = 55,408. It means an yearly average of 1787, a monthly average of 149 and a daily average of five. In other words, in every four hours and 50 minutes one person was being killed for political reasons in West Bengal. The CPI-M can claim credit that instead of a murder an hour they could limit it to four hour and 50 minutes per murder. What an achievement!''
ये दैनिक स्टेट्समैन की रिपोर्ट है...
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जिस बाबा साहेब अंबेडकर की सामाजिक न्याय प्रणाली की बात वामपंथी कन्हैया कुमार कर रहा है...उन बाबा साहेब अंबेडकर का वामपंथियों के बारे में विचार भी पढ़ लीजिए..
''As regards the labour movement carried on by the Communist Party, there is no possibility of me joining them. I am confirm enemy of the communist, who exploit labour.''
ये वामपंथियों के बारे में बाबा साहेब अंबेडकर के विचार थे। साथी ठीक है कि तुम जेएनयू में बैठकर सामाजिक न्याय की बात करते हो, लेकिन तुम्हारे दल सत्ता में आते ही ऐसा बरताव क्यों करने लगते हैं? तब समतामूलक समाज की अवधारणा दिमाग के कौनसे बंद कोटर में जाकर बैठ जाती है? ठीक है, भारत इसे भी सहन कर लेगा, लेकिन कामरेड तुम अफजल का पाठ पढ़ोगे तो ना जनता सहेगी ना अदालत। तुम्हें बाहर की ज़रा सी हवा क्या लगी पर निकल आए। ठहरो अभी न्याय होने बाकी है। इंतजार करो अदालत के फैसले का

Tuesday, March 1, 2016

कहीं रवीश कुमार बौद्धिक आतंकवाद तो नहीं फैला रहे हैं …

एक महिला पत्रकार के मन में उठा सवाल, कहीं रवीश कुमार बौद्धिक आतंकवाद तो नहीं फैला रहे हैं …
Kanhaiya-Kumar
लेख -- ‘रवीश जी आपके इस कार्यक्रम में बहुत आवाजों को जगह मिली लेकिन कुछ आवाजे आपने छोड़ दी। मैं यहां केवल उन आवाजों का जिक्र करना चाहती हूं।’

सच में रवीश जी कमाल कर दिया आपने, रिपोर्टिंग और एंकरिंग का एक नया आयाम छूने के लिए आपने जो कोशिश की है इसे इलेक्ट्रॉनिक जर्नलिज्म में आने वाली पीढ़िया भी भुला नहीं पाएंगी। इस अंधेरे ने हमें आवाजे सुनवाई ऐसी आवाजे जो हमें उद्वेलित करती हैं, विवेक खोने को मजबूर करती हैं, वो सारी आवाजे जो यह साबित करती हैं कि देशद्रोह का विरोध करने वाले हम सब भारतवासी और चंद न्यूज चैनल्स गलत हैं और आप सही। कितनी आसानी से आपने अपनी बात हम पर सबके मन में बैठा दी और साफगोई और निष्पक्ष होने की वाह-वाही भी लूट ली।
रवीश जी आपके इस कार्यक्रम में बहुत आवाजों को जगह मिली लेकिन कुछ आवाजे आपने छोड़ दी। मैं यहां केवल उन आवाजों का जिक्र करना चाहती हूं।
आपके कार्यक्रम में उन कुछ लोगों की आवाजें तो थी जिन्होंने कन्हैया को बिना जांच पूरी हुए देशद्रोही साबित कर दिया, लेकिन वो आवाजें कहां थी जिन्होंने बिना जांच पूरी हुए कन्हैया को निर्दोष करार दे दिया और जिनमें एक आवाज आपकी भी है।
आपने उन आवाजों की बात तो की जो यह कहती हैं कि कन्हैया की रिहाई की मांग करने वाले केवल लेफ्ट छात्र नहीं, बल्कि अन्य भी हैं, लेकिन वो आवाजें क्यों नहीं सुनवाई जो कहती है कि कन्हैया की गिरफ्तारी की मांग करने वाले केवल एबीवीपी के ही नहीं बल्कि सामान्य लोग भी हैं।
आपने वकीलों की आवाजें सुनवाई जो वंदे मातरम के नारे लगा रहे थे, और देशद्रोहियों को गालियां दे रहे थे लेकिन उमर खालिद समेत बहुत से जेएनयू छात्रों के उन नारों की आवाज कहा थीं जिनमें वो देश की बर्बादी, और भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे लगा रहे थे और जिसे आपने डॉक्टर्ड टेप कह दिया (बिना जांच के)।
आपके कार्यक्रम में उन आवाजों को जगह मिल गई जो कहते हैं कि यह देशद्रोह नहीं बल्कि बीजेपी और आरएसएस बिग्रेड द्वारा किया जा रहा भगवा सेफ्रोनाइजेशन का मामला है, लेकिन उन आवाजों का क्या हुआ जो कहते हैं कि कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा के लोग अपने फायदे के लिए देशद्रोह जैसे मामले पर दोषी छात्रों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
आपके कार्यक्रम में जेएनयू टीचर्स की आवाजों को जगह मिली लेकिन कर्नल जीडी बख्शी के आंसू क्यों नहीं सुनाई दिए।
आपने उन चंद बीजेपी ट्वीट्स को जगह दी जो राजदीप सरदेसाई और बरखा को गाली देते हैं और कुछ उन ट्वीट्स को भी, जो उनकी रिपोर्टिंग को सही ठहराते हैं, लेकिन वो हजारों ट्वीट्स कहा हैं, जो सामान्य लोगों के थे और जो एनडीटीवी की रिपोर्टिंग, बरखा, राजदीप सरदेसाई सबके द्वारा की गई रिपोर्टिंग को सिरे से नकारते हैं।
आवाजें तो और भी बहुत हैं लेकिन अगर उनको भी जगह मिल जाती तो शायद आप अपने मनसूबों में कामयाब नहीं हो पाते, जो हर हाल में बीजेपी का विरोध करना चाहते हैं चाहे वो देशद्रोह की कीमत पर ही क्यों ना हो। और फिर हमारी सरकार भी सही समय पर सही कार्रवाई करना नहीं जानती तो सजा तो उसे मिलनी ही चाहिए। एक व्यक्ति की भूल हमेशा ही दूसरे के लिए फायदे का सबब बनती है, जैसा कि इस मामले में हुआ, सरकार की ढिलाई, आप जैसे पत्रकारों को अपनी बातें मनवाने का अवसर दे रही है तो उठाईए अवसर का लाभ।
मेरी चिंता तो बस इतनी है कि इस पूरे मामले ने एक नए तरह के आतंकवाद को जन्म दिया है जिसे कहते हैं बौद्धिक आतंकवाद (इंटलेक्चुल टेररिज्म)… जो सीधे लोगों की सोच पर प्रहार करता है, ना गोली, ना खून, ना दंगा, ना खर्चा… और रिजल्ट- सौ फीसदी। देश के अंदर ही पनपने वाले इस आतंकवाद के चलते देश को दूसरे आतंकवादियों की तो जरूरत ही नहीं रही है। बहुद जल्दी आप और आप जैसे लोग अन्य देश विरोधी ताकतों का मोहरा बनेंगे, इस आतंकवाद को फैलाने और भारत और भारतीयता की जड़ को हिलाने के लिए…।
(फेसबुक: पत्रकार चित्रा गुप्ता की फेसबुक वॉल से )

Sunday, February 28, 2016

आज राहुल गाँधी कहते है की केंद्र सरकार कन्हैया की आवाज दबा रही है

आज राहुल गाँधी कहते है की केंद्र सरकार कन्हैया की आवाज दबा रही है ..विश्व में पहली बार कम्यूनिस्टो ने चुनावो द्वारा सत्ता केरल में 1957 में हासिल की थी.. ई एम् एस नम्बूदरीपाद केरल के मुख्यमंत्री बने ... भारत के किसी राज्य में पहली बार गैर कांग्रेसी दल सत्ता में आया था ...
नम्बूदरीपाद ने सत्ता मिलते ही अपना वामपंथी एजेंडा लागु करना शुरू कर दिया ..केरल में भारत के सम्विधान को भी मानने से जैसे इंकार कर दिया था ..फिर मात्र २ साल बाद ही नेहरु ने नम्बूदरीपाद सरकार को बर्खास्त कर दिया .आजादी में बाद नम्बूदरीपाद सरकार पहली ऐसी सरकार थी जिसे आर्टिकल 356 के द्वारा केंद्र ने बर्खास्त किया हो ...
और आज वही वामपंथी सूअर कांग्रेस की गोद में बैठकर आजादी की बात करने लगे

और एक बात भारत में मुस्लिम लीग से बड़ा साम्प्रदायिक दल दूसरा कोई नही होगा ..इसकी स्थापना ही सिर्फ मुसलमानों के लिए की गयी थी .. देश को तोड़ने में मुस्लिम लीग का सबसे बड़ा हाथ था ..आजादी के बाद भी मुस्लिम लीग के कुछ सदस्य भारत में ही रहे और उन्होंने मुस्लिम लीग को जिन्दा रखा ..भारत में मुस्लिम लीग का सबसे ज्यादा प्रभाव केरल में है..
मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन करके सीपीआई ने केरल में पांच बार सरकार बनाई है... वामपंथी दलों की ये कैसी धर्मनिरपेक्षता की ये मुस्लिम लीग को साम्प्रदायिक पार्टी नही मानते जिसके सम्विधान में ही लिखा है की हम सिर्फ मुस्लिमो की भलाई के लिए काम करेंगे और भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनायेंगे

Monday, February 22, 2016

ब्राह्मणवाद से किसको आज़ादी चाहिए। जिसे आने वाली पीढ़ी हरामज़ादी चाहिए।

ब्राह्मणवाद से किसको आज़ादी चाहिए।
जिसे आने वाली पीढ़ी हरामज़ादी चाहिए।
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जो ब्रह्म की साधना से जीवन संजोता है।
मूर्खों!वास्तव में वही तो ब्राह्मण होता है।
ये मिश्रा;शुक्ला ब्राह्मण नहीं नेमप्लेट हैं।
कर्म से विनष्ट हुए कोई भला कैसे श्रेष्ठ है?
हालांकि मानता हूँ के;
आनुवंशिकता इन सबमें सहायक है।
मगर,शेष जातियों में भी;
कई ब्राह्मण कहे जाने के लायक़ हैं।
भूल गए;व्यास की माँ मल्लाह कन्या थीं।
तुलाधर वैश्य की माँ जाति से बनिया थीं।
वाल्मीकि की लूट से जनता बेहाल थी।
जाबाल ॠषि की माताजी चाण्डाल थी।
विश्वामित्र थे तो क्षत्रिय;बने गए थे ब्राह्मण।
अरे!तुम वो तपस्या क्या समझोगे चारण?
तुम्हें तो अपने ही देश की बर्बादी चाहिए।
ब्राह्मणवाद से किसको आज़ादी चाहिए???
जिसे आने वाली पीढ़ी हरामज़ादी चाहिए।
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कर दी है तुमने लोकतंत्र की छीछालेदर।
कमीनीस्ट!देश बेचो;दोगे अपनी ही मातर।
उतनी ही ग़द्दारी फैलाओ;जितनी हो चादर।
के भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी होकर।
ये तो सोचो;माँबेचकर जितने जुटा लो डालर।
काम न आएगी तुमको;विदेशियों की झाँझर।
राष्ट्रवाद से अगर तुमको आज़ादी चाहिए।
तुम्हें देश के हर घर में आतंकवादी चाहिए।
तो सभी ख़ालिदों!तुम्हें मौत से शादी चाहिए।
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Tuesday, February 16, 2016

वामपंथ नक्सलियों के समर्थक है

वामपंथ: ढहते किले बढती बौखलाहट
साहब लोग नक्सलियों के समर्थक है | साहब लोग अपना अपना एनजीओ चलाते हैं | साहब लोग छंटे हुए कथाकार हैं कहानियाँ लिखने में माहिर हैं | साहब लोगो का चार खुरों वाला नया भगवान् है | कहाँ से आया, कौन लाया, क्या किया इस भगवान् ने कुछ पता नहीं | साहब लोग आर्य अनार्य का विवाद खड़ा करते हैं | इसके पक्ष में संस्कृत कोट करते हैं बिना यह जाने कि संस्कृत तो आर्यों की भाषा थी | साहब लोग संघ को गाली देते हैं | यहाँ तक कि जिस संघ का कभी हिस्सा नहीं रहे उस पर कवर पेज स्टोरी लिखते हैं | साहब लोग देश की राजधानी में खुलेआम पाकिस्तान जिन्दावाद और हिंदुस्तान के टुकड़े होंगे के नारे लगाते हैं | बिना ये सोचे कि गर हिंदुस्तान न रहा तो इन लोगो को दाना पानी कहां से मिलेगा ? कहने की जरूरत नहीं कि साहब लोग JNU‬ वाले बौधिक आतंकवाद की उपज हैं | ऐसे तथाकथित “साहब लोग” हमारे देश में बुद्धिजीवी और समाजसेवी कहे जाते हैं |

इन "घाघ" बुद्धिजीवियों के हाथ में पूरे 60 साल देश की शिक्षा व्यवस्था का दारोमदार था | इन्हीं लोगो ने वीर शिवाजी को "पहाड़ी चूहा" और और सिख गुरुओं के हत्यारे औरंगजेब को "सूफी बादशाह" बनाया | भगत सिंह को "आतंकवादी" और शोभा सिंह को "महिमामंडित" करने वाले यही लोग थे | इतिहास के नाम पर जमा कूड़ा करकट देश के युवाओ को पीड़ी दर पीड़ी शर्बत बता पिलाया गया | यहाँ तक कि हमारी जड़ो से हमें काट के रख दिया | हेमू कौन था और दाहिर कौन हमें नहीं पता | हरी सिंह नलवा का नाम पूछने पर हम अपने कान खुजाते नजर आते हैं | क्यों भाई कौन बताएगा हमें इनके बलिदान के बारे में ? कौन कहेगा उन लाखों अनाम शहीदों की गाथा जो पिछले १२०० सालो में देश के लिए बलिदान हो गये ?
पूरे 60 साल देश ने इन लोगो को बिना उफ़ किये भुगता है | मगर आज महज 2 सालों में साहब लोगो के तख़्त हिलने लगे हैं | एक "हाफ चड्डी" पहने कल का चाय वाला छोकरा आज "लाल सलाम" का भगवाकरण करने में लगा है और साहब लोग कुछ नहीं कर पा रहे हैं | तय नहीं कर पा रहे हैं कि वैचारिक प्रतिरोध करें या फिर से मार्क्स की "खूनी क्रांति" लिख दें | पर क्या करें पूरा राष्ट्र केरल तो है नहीं जहाँ सघियों के आप कबाब बना कर खा सकें | “माना आपके शास्त्रों में लिखा है कि सत्ता बन्दूक की नालियों से होकर गुजरती है | पर ये चीन या रूस नहीं है जहाँ कत्ल की नयी -२ इबारतें लिखी गयी | ये भारत है जहाँ हमेशा शास्त्र ने शस्त्र को जीता है |”
ये तो महज एक शुरुवात है | मिर्च अभी और तेज होगी | वामपंथ अभी और बेनकाब होगा | आपका बौधिक आतंकवाद अब समाप्ति की ओर है | आवाहन हो चुका है | ध्यान से सुनिए आपको नए भारत की पदचाप सुनाई देगी | भारत नव निर्माण के पवित्र यज्ञ में आहूति लगना शुरू हो चुकी हैं | हो सके तो आप भी इस यज्ञ हिस्सा बनिए और खुद को शुद्ध कीजिये | वरना तय जानिए कि इस बार इतिहास हमारी कलमे लिखेंगी | जिसमे आपका असल वर्णन विस्तार से होगा |
साभार

Monday, February 15, 2016

ये कौन सी वामपंथी विचारधारा है..?

देश में घटती हुई वामपंथीं (छद्यम धर्मनिरपेक्षता वाले दल) की विचारधारा और समर्थकों की कमी के कारण घबराकर अब गाली गलौज जातिवादी और देशद्रोही वाली राजनीति करने लगे..!
दिल्ली में पढें लिखे सभ्य जिंस टीशर्ट पहनने वाले वामपंथी छात्रों और छात्राओं द्वारा जो विरोध प्रदर्शन का ढोंग किया और देश के प्रधानमंत्री और दिल्ली पुलिस (संविधान और कानून के रक्षक) के लिये जो शब्दों का इस्तेमाल गाली गलोज के रुप में की उससे तो ऐसा प्रतीत होता ये छात्र छात्रायें कॉलेज या विश्वविधालय में गाली गलौज दंगा फसाद और जातिवाद पर PHD/ Diploma कर रहों हों..?
( रोहित वेमुला/दलित/ जातिवाद) की राजनीति करने लग गये यह देश के वामपंथियों के लिये सोचने वाली बात है..!
ये कौन सी वामपंथी विचारधारा है..?
ये विचारधारा कार्ल मार्क्स की लेनिन की या ज्योति बसु की वामपंथी विचारधारा तो नहीं लगती ..!
वामपंथी/कामरेड प्रकाश करात वृन्दा करात (पति-पत्नी)
सीताराम येचूरी D राजा और अन्य वामपंथी चिंतको के लिये सोचने वाली बात है..?

Sunday, February 14, 2016

JNU - जेएनयु का पूरा सच

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की छवि न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक स्वतंत्र उच्च शिक्षण संस्थान की है बल्कि यहां हर तरह की अभिव्यक्ति और बहस के लिए जगह मिलती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है लेकिन संसद पर हुए आतंकी हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी मनाकर उसे शहीद बताना और भारत विरोधी नारे लगे जैसी हरकतों को देश हित में नहीं कहा जा सकता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना उच्च शिक्षा में शोध कार्यों को बढ़ावा देने के लिए की गई थी, लेकिन वर्तमान समय में चल रहे विवादों के बीच ऐसा लगता है कि यह भारत विरोधियों का किला बन गया है।
इससे पहले भी जेएनयू छात्र कई बार देश विरोधी गतिविरोधी गतिविधियों में पैरवी करते नजर आए। चाहे फिदायीन इशरत जहाँ का मामला हो या संसद हमले के जिम्मेदार अफजल गुरु का मामला हो या मुंबई हमलों के लिए जिम्मेदार याकूब मेमन की फाँसी का सवाल हो। विपक्षी कई बार आरोप लगाते रहे हैं कि जब कभी चीन की फौज विवादित क्षेत्र से भारत में घुस आती है या पाकिस्तान की सेना सीमा पार से हमारे जवानों पर हमला करती है तो इनकी आवाज देश हित में क्यों नहीं उठता।

जेएनयू में कथित हिंदू विरोधी ही नहीं हिंदुस्तान विरोधी करतूतों की एक लम्बी फेहरिस्त है। कभी तिरंगे का, तो कभी देवी-देवताओं का अपमान।

इन आयोजनों को देखने के बाद यह साफ समझा जा सकता है कि इसका उद्देश्य या तो भारतीय संस्कृति और भारतीय संविधान को नीचा दिखाना है या फिर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना है।
 
परिसर में इन आयोजनों को देखते हुए जेएनयू पर देशविरोधी गतिविधियों को लेकर उठने वाली चिंता वाजिब ही है। वर्ष 2000 में करगिल में युद्घ लड़ने वाले वीर सैनिकों को अपमानित कर यहां चल रहे मुशायरे में भारत-निंदा का समर्थन किया। 26 जनवरी, 2015 को इंटरनेशनल फूड फेस्टिवल के बहाने कश्मीर को अलग देश दिखाकर उसका स्टाल लगाया गया। जब नवरात्रि के दौरान पूरा देश देवी दुर्गा की आराधना कर रहा था, उसी वक्त जेएनयू में दुर्गा का अपमान करने वाले पर्चे, पोस्टर जारी कर न सिर्फ अशांति फैलाई गई बल्कि महिषासुर को महिमामंडित कर महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन किया गया।

इससे पहले 24 अक्टूरबर, 2011 को भी कावेरी छात्रावास में लार्ड मैकाले और महिषासुर: एक पुनर्पाठ विषय पर सेमिनार में दुर्गा के सम्बन्ध में अपमानजनक टिप्पणियों से मारपीट की भी नौबत आ गई थी।

यही नहीं जेएनयू छात्रों ने गौमांस फेस्टिवल मनाने की जिद पर अड़े संगठनों को दिल्ली उच्च न्यायालय रोक लगाई। सबसे हैरत की बात है कि जब 10 अप्रैल, 2010 को जब पूरा देश छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलिओं के गोलियों से शहीद हुए 76 जवानों के गम में गमगीन था, उसी समय जेएनयू में जश्न मनाया जा रहा थे। यही नहीं उसका विरोध करने पर माओवादियों-नक्सलवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले छात्रों ने उन पर हमला किया गया जिसमें में कई छात्र बुरी तरह घायल हो गए थे। छत्तीसगढ़, झारखण्ड सहित कुछ राज्यों के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए ऑपरेशन ग्रीन हंट नामक अभियान का विरोध जेएनयू छात्रों ने पर्चे और पब्लिक मीटिंग के जरिए की।

जब नवंबर 2005 में मनमोहन सिंह के भाषण में छात्रों ने नारेबाजी की और पर्चे फेंके तो भी इनके सहिष्णुता  पर सवाल उठाए गए थे। हंगामा इस कदर मचा था कि बीच बचाव के लिए पुलिस को आगे आना पड़ा। अगस्त 2008 में जब विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज विभाग में अमेरिका के अतिरिक्त सचिव रिचर्ड बाउचर को भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के संबंध में बोलना शुरू किया तो लाल झण्डा उठाकर छात्रों ने अमेरिका हाय-हाय, परमाणु समझौता रद्द करो जैसे नारे लगाते हुए एस कदर हंगामा मचाया कि अंत में कार्यक्रम को ही स्थगित करना पड़ा और रिचर्ड बाउचर भी अपनी बात नहीं रख पाए थे।
जब 5 मार्च, 2011 को आयोजित एक सेमिनार जिसमें अरुंधती राय ने भाग लिया था, उसमें न सिर्फ भारत सरकार और संविधान के विरोध में नारे लगाए गए थे बल्कि बांटे गए पर्चे में जूते के तले राष्ट्रीय चिन्ह को दिखाया गया। यही नहीं 30 मार्च, 2011 और 2015 में को भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट विश्वकप के मैच में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए और भारत का समर्थन कर रहे छात्रों पर हमले किये गए। 24 अगस्त, 2011 को अन्ना आंदोलन के समय तिरंगे को फाड़कर पैरों से रौंदा भी गया।
विविधता में एकता भारत की सदियों पुरानी पहचान रही है। भारत में विभिन्न प्रकार के मत-मतान्तरों के बीच जिस प्रकार का सौहार्दपूर्ण सामाजिक तानाबाना देखने को मिलता है, वह शायद पूरी दुनिया में ढूंढने से भी दिखाई नहीं पड़ता। 2014 से पहले तक जेएनयू के कैंपस में इजरायल के किसी व्यक्ति यहां तक कि राजदूत तक का घुसना भी प्रतिबंधित हुआ करता था।

जहां तक वामपंथी विचारधारा की बात है तो न सिर्फ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी बल्कि उत्तर कोरिया, वियतनाम, क्यूबा, चिली, वेनेजुएला या पूर्व सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टियों के किसी सदस्यों ने कभी देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त नहीं पाए गए।
कहा जाता है कि जेएनयू की स्थापना के समय की तत्कालीन इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने अपने अनुकूल बौद्धिक माहौल तैयार करने, अपने वैचारिकता के अनुकूल इतिहास बनाने के लिए जेएनयू की स्थापना की थी। सत्ता पोषित सुविधा सत्तर के दशक की शुरुआत में जब इंदिरा गांधी को विरासत बचाने के लिए वामपंथियों की मदद लेनी पड़ी, वही वो वक्त था जब कम्युनिस्टों ने भी शिक्षण संस्थाओं पर कब्जा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि इंदिरा गांधी के काल में लेफ्ट विचारधारा के लोगों को संस्थान में महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया। लेकिन धीरे धीरे जेएनयू छात्र संगठन की ताकत लगातार बढ़ती गई और इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बार यहां के छात्रों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को परिसर के अंदर भी नहीं आने दिया था और लालकृष्ण आडवाणी को विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर ही रोक दिया था।
तब से लेकर आज तक जेएनयू में वैचारिक प्रतिनिधित्व के नाम पर एक ही विचारधारा का कब्जा रहा है? चाहे कश्मीर का मामला हो या उत्तर-पूर्व में नक्सल-माओवादी क्षेत्रों में सक्रिय हिंसा फैलाने वाले देशद्रोही और अलगाववादी ताकतों को समर्थन देने की, जेएनयू के छात्र संगठन हमेशा ही आगे नजर आते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर जी एन सार्इं बाबा हों या एसएआर गिलानी, खुफिया एजेंसियों ने कई बार इन्हे देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाया।

लेकिन यहां कई साकारात्मक बहसें भी देखा जा सकता है। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही कहा जा सकता है कि यहां समाज में छुपा लिए जाने वाले मुद्दों पर सीमा से आगे बढ़कर बहस की जाती रही है। चाहे वो समलैंगिकता की स्वतंत्रता पर बहस हो या महिलाओं को स्वछंद रहने और काम करने की आजादी का मद्दा यहां हर मुद्दे पर गंभीर बहस का आयोजन देखा जा सकता है।
जब दिल्ली भर में कांग्रेस सरकार की नाक के नीचे सिखों का कत्ल हो रहा था तब जेएनयू ने ही सिखों को शरण दी और देशभर में गुंडागर्दी का पर्याय बन चुकी छात्र राजनीति का शानदार नमूना भी पेश किया। इसी वैचारिक खुलेपन का आड़ लेकर कई बार अतिवादियों ने यहां से अपना एजेंडा भी चलाया। एंटी इस्टैब्लिशमेंट काम करना जेएनयू की परिपाटी रही है। परमाणु ऊर्जा, किसान आत्महत्या, भूमि अधिग्रहण, देश का औद्योगिकरण आदि मुद्दों पर इनका विरोध खुद तक सीमित रहा।