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Friday, June 17, 2016

एक कैराना - गजियाबाद के कैला भट़टा से 300 वाल्मिकी हिंदू परिवारों पलायन

एक कैराना - गजियाबाद के कैला भट़टा से 300 वाल्मिकी हिंदू  परिवारों पलायन


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Tuesday, May 31, 2016

कब होगी अख़लाक़ के परिवार की गिरफ़्तारी, यूपी में गौहत्या व् गौमांस पर 2 साल की है सजा





उत्तर प्रदेश के दादरी में अख़लाक़ के घर पर गाय के बछड़े की हत्या कर उसके शव को खाने का मामला अब साफ़ हो गया है
मथुरा लैब में जांच हुए मांस से साफ़ हो गया है की अख़लाक़ के फ्रिज में गाय का ही मांस रखा हुआ था
तथा उसकी हत्या की गयी थी तथा अख़लाक़ के साथ उसके परिवार ने भी गाय का मांस खाया था
अब अख़लाक़ तो दुनिया में नहीं है पर उसके परिवार के सदस्य अब भी मौजूद है, जिसमे उसकी बीवी तथा बच्चे इत्यादि सब है
आपको बता दें की उत्तरप्रदेश में गौहत्या तथा गौमांस रखने, खाने पर 2 साल की कड़ी कैद तथा जुर्माने की सजा है
अब जब साफ़ हो गया है की अख़लाक़ तथा उसके परिवार ने गौमांस खाया था तथा उसका मांस भी फ्रिज में रखा था तो अब देखना होगा की यहाँ भारत का कानून चलता है या नहीं
इस मुद्दे को पुरे देश को उठाना होगा तथा गौहत्यारे परिवार को जेल की सलाखों तक पहुचाना होगा और जनता के पैसे जो इनको रबड़ी के रूप में बांटे गए है इनसे सब वसूली करवाना होगा।






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दादरी कांड: फॉरेंसिक रिपोर्ट में खुलासा- अखलाक के घर फ्रिज में था गौमांस

दादरी कांड: फॉरेंसिक रिपोर्ट में खुलासा- अखलाक के घर फ्रिज में था गौमांस


Thursday, March 24, 2016

ये कौन सी सहिष्णुता ?

ये कौन सी सहिष्णुता ?
इस तरह की गई थी डाक्टर नारंग की हत्या, एक महिला भी थी शामिल
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी में बेटे के साथ क्रिकेट खेल रहे 41 वर्षीय दंत चिकित्सक की गेंद सड़क पर एक मोटरसाइकिल सवार को जा लगी। जिसके बाद हुई बहस में कुछ लोगों ने डाक्टर की पीट-पीट कर हत्या कर दी। पश्चिमी दिल्ली के विकासपुरी इलाके में बुधवार आधी रात को यह वारदात हुई। दांत के डाक्टर पंकज नारंग अपने बेटे के साथ घर में क्रिकेट खेल रहे थे।
पंकज नारंग
पंकज नारंग के रिश्तेदार पर भी हमला
गेंद घर की बालकनी से निकल कर मोटरसाइकिल सवार को जा लगी। इसके बाद बहस शुरू हो गई। पुलिस ने बताया कि बाइकसवार ने अपने 10 दोस्तों को बुला लिया और पंकज नारंग को घर से खींचकर डंडों और ईंटों से पीट-पीट कर मार डाला। बताया गया है कि डाक्टर के एक रिश्तेदार ने इसमें हस्तक्षेप करने की कोशिश की, लेकिन उस पर भी हमला किया गया। इससे पहले कि पुलिस वहां पहुंच पाती, हमलावर घटनास्थल से फरार हो गए।
आरोपियों को पुलिस ने किया गिरफ्तार
पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि हमने इस मामले में शामिल पांच लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसमें एक महिला भी शामिल है। चार लड़कों को भी पकड़ा गया है। ये सभी झुग्गी बस्तियों में रहते हैं। गिरफ्तार महिला की पहचान मयस्सर के रूप में हुई है। दो अन्य आरोपियों की पहचान एक ही नाम आमिर खान के रूप में हुई है। दो अन्य आरोपियों में गोपाल सिंह व नसीर खान हैं। एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि नसीर खान मुख्य आरोपियों में से एक है और उस वक्त किशोर के साथ वही मोटरसाइकिल चला रहा था।

Tuesday, March 1, 2016

ये जो मोदी विरोध का नशा है ना...बड़ा जहरीला होता है...!

हुजूर-ए-आला ये जो मोदी विरोध का नशा है ना...बड़ा जहरीला होता है जी...प्यार, मोहब्बत,भाईचारे,अमन की बाते करने वाले तथाकथित ह्यूमनवादी कब इस जहर की चपेट में आकर इस समाज के लिये जहरीले नाग बने जा रहे हैं इन्हें खुद नहीं समझ आ रहा।
देशद्रोही और देशभक्ति के सर्टिफिकेट पर रं रो करने वालों की दोगलईती देखो साहेब....सिर्फ भाजपा को सपोर्ट करने भर से ही ये खुद एक सेकंड में लोगों को संघी का सर्टिफिकेट बांटने से नहीं चूकते।
इस फॉर्मूले से तो 2014 लोस चुनावों में भाजपा को वोट देकर भारी बहुमत से उसकी सरकार बनाने वाली देश की आधी जनता इनके लिये संघी हो गई...और संघियों से इनकी नफरत जगजाहिर है.. फिर देश की आधी जनता मतलब संघियों से नफरत करने वाले खुद किस मुंह से भाईचारे की बात करतें हैं?
श्री श्री रविशंकर जी वर्तमान में भारत के सिंगल ऐसे आध्यात्मिक गुरु हैं जिनकी मैं दिल से इज्जत करता हूँ...ये हमेशा प्यार मुहब्बत भाईचारे की बात करतें हैं...इन्होंने आज तक कभी नफरत फैलाने वाला कोई विवादित बयान नहीं दिया....ना ही ये कभी किसी भी बात के लिये विवादों में ही आये...लेकिन सिर्फ मोदीजी को सपोर्ट करना इतना बड़ा गुनाह हो गया की एक टुच्ची सी वजह से खुद को मानवतावादी कहने वाले दोगले इनके चरित्रहनन पूरे जी जान से जुट गये।
हम पर असहिष्णु,अंधभक्त का आरोप लगाने से पहले इन्हें खुद के गिरेबान में झाँककर देखना चाहिये की सिर्फ विपरीत विचारधारा होने की वजह से दिन भर भक्त,अंधभक्त, संघी का सर्टिफिकेट बाँटा करते हैं......खुद विपरीत विचारधारा को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं और हमको असहिष्णु बोलते हैं...गजब की कुत्तई है यार।
अभी तक जिस कन्हैया को खुद का बाप बनाये घूम रहे थे उसी बाप ने सेना को बलात्कारी बोल दिया...अब बाप की बात से लौंडा तो सहमत होगा ही...है की नही?
मतलब अब तुम उसी सेना को बलात्कारी कहो जिसकी वजह से सुरक्षित घर में बैठे बुद्धिजीवीयापा छांट रहे हो फिर इसी बात पर हम तुमको देशद्रोही कह दे तो हम असहिष्णु, अंधभक्त संघी हो गये?
अभी वो एक जो फरार हो गया विजय माल्या...कॉंग्रेस के राज में 9000 करोड़ का लोन लिया...कोई पुछत्तर नहीं था...अभी भाजपा की सरकार बनते ही पूछताछ हुई...खुद को फंसता देख देश छोड़कर फरार हो गया....अब इसके लिये भी इल्जाम मोदी पर?
माने कॉंग्रेस होती तो 9000 करोड़ का लोन और दे देती....किसी को कानोकान खबर ना लगती...मिडीया में कोई बवाल ना होता....सब कुछ वैसे ही चलता रहता तब तो बढ़िया था लेकिन मोदी ने उसकी पूँछ पर लात रख दी तो मोदी बुरे हो गये? मतलब अब सच्चाई सामने लाना भी गुनाह हो गया?
अभी वो भागा नहीं की बगैर किसी सुबूत के सरकार पर उसको भगाने का इल्जाम लगा दिया...अबे कुछ दिन इन्तजार तो कर लेते...अगर कोई कार्यवाही ना होती तो हम भी तुमसे सहमत होते...पर तुम तो मोदी विरोध में इतने अंधे हो चुके हो की बिना सोचे समझे तुरन्त आरोप फेंकने को तैयार रहते हो...अबे कुछ तो सबर चाटो...
दिल में भरे मोदी से नफरत का जहर निकाल नहीं पा रहे और हमे भाईचारे का ज्ञान बाँटते हैं।
खुद नफरत का बीज बोकर हम पर जहर की खेती का आरोप लगाते हैं...भाई ताली एक हाँथ से नहीं बजती.....दूसरों से जैसे व्यवहार की अपेक्षा करते हो पहले खुद वैसा व्यवहार करना सीखो...
सबको पता है सांप को चाहे कितना भी दूध पिलाओ लेकिन साला वो काटेगा जरूर.....जाओ पहले खुद के जहर भरे दांत तोड़कर आओ फिर अगले से दूध पिलाने की उम्मीद करना।

Sunday, February 14, 2016

'चंदा बंद तो धंधा बंद' - चंदा पर चौकीदारी क्या लगी देश में तथाकथित असहिष्णुता ही आ गयी है.

  • पिछड़े डेढ़-दो साल से इस मुल्क में अघोषित एजेंडे के तहत अजीब सा माहौल दिखाने का मीडियाई मंचन चल रहा है. निर्देशन से लेकर पटकथा तक और मंचन से लेकर मुनादी तक, सबकुछ तय एजेंडे से हो रहा है. ऐसा करने वाले कोई और नहीं बल्कि वही लोग हैं जो कभी नरेंद्र मोदी पर फब्तियां कसते थे और देश की अस्मिता की परवाह किये बगैर उनके खिलाफ अमेरिका में वीजा रुकवाने का लेटर लिखते थे. सेक्युलर कबीले के ये लोग मोदी का नाम लेकर लोगों को डराते भी थे. लेकिन इनकी तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी प्रचंड बहुमत से जीतकर आ गये. अमेरिका ने भी सर आँखों पर बिठा दिया. जिनको डराया गया वो आज पहले से ज्यादा सुरक्षित हैं. अब चूँकि सरकार तो बदल ही गयी थी लेकिन सरकार चलाने की संस्कृति भी बदल गयी है. सरकार चलाने की संस्कृति का यह बदलाव ही इस छटपटाहट की मूल वजह है. अब केंद्र में जो सरकार है वो 'मौन' सरकार नहीं है बल्कि 'बोलती' हुई सरकार है. मोदी ने आते ही जो शुरुआती डंडा चलाया उसके तहत सीधा हमला उन तथाकथित गणमान्यों पर हुआ जो बिना हिसाब दिए विदेशी चंदे पर पल रहे थे. चंदा आ तो बेहिसाब रहा था लेकिन जा कहां रहा था इसका कोई लेखा-जोखा नहीं था. इसी नस पर मोदी ने ऊंगली क्या रख दी, मच गया चौतरफा कोहराम!
पिछले साल ही ये खबर आई थी कि मोदी सरकार ने विदेशी चंदे पर पल रहे उन 9000 से ज्यादा गैर-सरकारी संगठनों का पंजीकरण लाइसेंस निरस्त कर दिया है, जिन्होंने विदेशी चंदा अधिनियम कानून अर्थात एफसीआरए का उलंघन किया है. 16 अक्तूबर 2014 को गृहमंत्रालय द्वारा कुल 10343 गैर-सरकारी संगठनों को वर्ष 2009 से लेकर 2012 तक मिले विदेशी चंदे का ब्यौरा माँगा गया था. जवाब के लिए तय 1 महीने की समय सीमा बीत जाने के बाद तक मात्र 229 गैर-सरकारी संगठनों ने इसका जवाब दिया. बड़ा सवाल ये कि बाकी संस्थाओं ने हिसाब क्यों नहीं दिया? क्या दाल में कुछ काला था या कहीं पूरी  दाल तो काली नहीं थी? चंदे के धंधे से फल-फूल रहे इस कारोबार पर लगाम लगाने की कवायदों में ही केंद्र सरकार ने अमेरिका के बहु-चर्चित फोर्ड फाउंडेशन द्वारा भारत में दिए चंदे को निगरानी में रखने का आदेश जारी किया था. अगर बारीकी से मामलों को देखा जाय तो फोर्ड फाउन्डेशन पर सरकार की सख्त निगरानी बहुत पहले रखी जाने चाहिए थी, लेकिन न जाने किस परस्पर हितों को साधने के लिए पिछली संप्रग सरकार ने फोर्ड फाउन्डेशन को भारत में बिना किसी निगरानी के काम करने और पैसा देने की खुली छूट दे रखी थी.
फोर्ड फाउंडेशन का 'तीस्ता' कनेक्शन
फोर्ड फाउंडेशन पर गुजरात सरकार की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि, सबरंग ट्रस्ट और सबरंग कम्युनिकेशंस ऐंड पब्लिशिंग प्राइवेट लिमिटेड (एससीपीपीएल) फोर्ड फाउंडेशन के प्रतिनिधि कार्यालय हैं और फोर्ड फाउंडेशन लंबी अवधि की अपनी किसी योजना की वजह से इन्हें स्थापित करने के साथ ही इसका इस्तेमाल कर रहा है. फाउंडेशन ने सबरंग ट्रस्ट को 2,50,000 डॉलर और एससीपीपीएल को 2,90,000 डॉलर चंदे के तौर पर दिए हैं. बड़ा सवाल ये है कि गैर-सरकारी संगठनों का ताना-बाना बुनकर देश के समाजिक और राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करने वाले किसी भी किस्म के विदेशी पैसों को निगरानी से बाहर क्यों रखा जाय? जिस सबरंग ट्रस्ट की बात यहां की जा रही है, उसका प्रत्यक्ष जुड़ाव तीस्ता सीतलवाड से है. लिहाजा फोर्ड और तीस्ता सीतलवाड़ के ट्रस्ट के बीच का यह चंदा कनेक्शन साफ समझा जा सकता है. अब चू्ंकि फोर्ड पर लगाम लगाई जा चुकी है तो इनसे सहानुभूति रखने वाले गिरोह की छटपटाहट भी स्वाभाविक है.

कहाँ के फारवर्ड थे ये?
संप्रग काल में फारवर्ड प्रेस नाम की एक हिंदी-अंग्रेजी पत्रिका भी बेहद संदिग्ध ढंग से उलूल-जुलूल विमर्शों को समय-समय पर हवा देती रही है. चाहे महिषासुर को मनगढ़ंत ढंग से स्थापित करने की असफल कोशिश का मामला हो अथवा विलियम कैरी को अगस्त-2011 के अंक में आधुनिक भारत का पिता बताने की कोशिश हो, ये पत्रिका लागातार ऐसे एजेंडे पर काम करती रही. जिस विलियम कैरी को 'आधुनिक भारत का पिता' लिखा गया है, उसका योगदान भारत में महज बाइबिल का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने से ज्यादा कुछ भी नहीं है. विलियम कैरी एक चर्च के पादरी भी रहे हैं. फारवर्ड प्रेस पत्रिका कांग्रेस-नीत सरकार के दौरान 2009 में शुरू होती है और दिल्ली के एक महंगे इलाके में सहजता से दफ्तर भी मिल जाता है. 2009 से अब तक इस पत्रिका की छपाई एवं कागज आदि की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आई थी, जबकि सही मायनों में इस पत्रिका के पास विज्ञापन न के बराबर थे. नाममात्र के विज्ञापनों को छोड़ दें तो यह पूरी पत्रिका बिना विज्ञापन के चल रही थी. इस पत्रिका से जुड़े ज्यादातर शीर्ष लोग क्रिश्चियन मिशनरीज से जुड़े हैं. लेकिन अब खबर है कि यह पत्रिका बंद हो रही है. जो पत्रिका संप्रग काल में बेबाक चल रही थी वो अचानक बंद क्यों हो गयी? क्या इसे 'चंदा बंद तो धंधा बंद' मान लिया जाए?
ऐसे में आज जब चारों तरफ नाटकीय ढंग से बुनावटी कोहराम का ढोंग रचा जा रहा है तो यह समझना बिलकुल भी मुश्किल नहीं है कि ये सब क्यों हो रहा है. सीधी सी बात है कि जो लोग बेरोक-टोक के विदेशी पैसों पर पल रहे थे अब उन्हें हिसाब देने के लिए कह दिया गया है. चूँकि हिसाब देने की आदत रही नहीं सो उनसे हिसाब मांगना 'असहिष्णुता' जैसा दिख रहा है. ऐसे में मोदी का विरोध करने के लिए मोदी विरोधी एका की स्थिति स्वभाविक है. चूँकि राजनीति में आने से पहले केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के एनजीओ भी करोड़ों का फंड फोर्ड से लेते रहे हैं, लिहाजा इस एका में उनकी भागीदारी भी कोई नई बात नहीं है. देश में असहिष्णुता सिर्फ उनके लिए है जिनकी अवैध खुराक मोदी ने रोक रखी है. चंदा पर चौकीदारी क्या लगी देश में तथाकथित असहिष्णुता ही आ गयी है.

JNU - जेएनयु का पूरा सच

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की छवि न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक स्वतंत्र उच्च शिक्षण संस्थान की है बल्कि यहां हर तरह की अभिव्यक्ति और बहस के लिए जगह मिलती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है लेकिन संसद पर हुए आतंकी हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी मनाकर उसे शहीद बताना और भारत विरोधी नारे लगे जैसी हरकतों को देश हित में नहीं कहा जा सकता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना उच्च शिक्षा में शोध कार्यों को बढ़ावा देने के लिए की गई थी, लेकिन वर्तमान समय में चल रहे विवादों के बीच ऐसा लगता है कि यह भारत विरोधियों का किला बन गया है।
इससे पहले भी जेएनयू छात्र कई बार देश विरोधी गतिविरोधी गतिविधियों में पैरवी करते नजर आए। चाहे फिदायीन इशरत जहाँ का मामला हो या संसद हमले के जिम्मेदार अफजल गुरु का मामला हो या मुंबई हमलों के लिए जिम्मेदार याकूब मेमन की फाँसी का सवाल हो। विपक्षी कई बार आरोप लगाते रहे हैं कि जब कभी चीन की फौज विवादित क्षेत्र से भारत में घुस आती है या पाकिस्तान की सेना सीमा पार से हमारे जवानों पर हमला करती है तो इनकी आवाज देश हित में क्यों नहीं उठता।

जेएनयू में कथित हिंदू विरोधी ही नहीं हिंदुस्तान विरोधी करतूतों की एक लम्बी फेहरिस्त है। कभी तिरंगे का, तो कभी देवी-देवताओं का अपमान।

इन आयोजनों को देखने के बाद यह साफ समझा जा सकता है कि इसका उद्देश्य या तो भारतीय संस्कृति और भारतीय संविधान को नीचा दिखाना है या फिर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना है।
 
परिसर में इन आयोजनों को देखते हुए जेएनयू पर देशविरोधी गतिविधियों को लेकर उठने वाली चिंता वाजिब ही है। वर्ष 2000 में करगिल में युद्घ लड़ने वाले वीर सैनिकों को अपमानित कर यहां चल रहे मुशायरे में भारत-निंदा का समर्थन किया। 26 जनवरी, 2015 को इंटरनेशनल फूड फेस्टिवल के बहाने कश्मीर को अलग देश दिखाकर उसका स्टाल लगाया गया। जब नवरात्रि के दौरान पूरा देश देवी दुर्गा की आराधना कर रहा था, उसी वक्त जेएनयू में दुर्गा का अपमान करने वाले पर्चे, पोस्टर जारी कर न सिर्फ अशांति फैलाई गई बल्कि महिषासुर को महिमामंडित कर महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन किया गया।

इससे पहले 24 अक्टूरबर, 2011 को भी कावेरी छात्रावास में लार्ड मैकाले और महिषासुर: एक पुनर्पाठ विषय पर सेमिनार में दुर्गा के सम्बन्ध में अपमानजनक टिप्पणियों से मारपीट की भी नौबत आ गई थी।

यही नहीं जेएनयू छात्रों ने गौमांस फेस्टिवल मनाने की जिद पर अड़े संगठनों को दिल्ली उच्च न्यायालय रोक लगाई। सबसे हैरत की बात है कि जब 10 अप्रैल, 2010 को जब पूरा देश छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलिओं के गोलियों से शहीद हुए 76 जवानों के गम में गमगीन था, उसी समय जेएनयू में जश्न मनाया जा रहा थे। यही नहीं उसका विरोध करने पर माओवादियों-नक्सलवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले छात्रों ने उन पर हमला किया गया जिसमें में कई छात्र बुरी तरह घायल हो गए थे। छत्तीसगढ़, झारखण्ड सहित कुछ राज्यों के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए ऑपरेशन ग्रीन हंट नामक अभियान का विरोध जेएनयू छात्रों ने पर्चे और पब्लिक मीटिंग के जरिए की।

जब नवंबर 2005 में मनमोहन सिंह के भाषण में छात्रों ने नारेबाजी की और पर्चे फेंके तो भी इनके सहिष्णुता  पर सवाल उठाए गए थे। हंगामा इस कदर मचा था कि बीच बचाव के लिए पुलिस को आगे आना पड़ा। अगस्त 2008 में जब विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज विभाग में अमेरिका के अतिरिक्त सचिव रिचर्ड बाउचर को भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के संबंध में बोलना शुरू किया तो लाल झण्डा उठाकर छात्रों ने अमेरिका हाय-हाय, परमाणु समझौता रद्द करो जैसे नारे लगाते हुए एस कदर हंगामा मचाया कि अंत में कार्यक्रम को ही स्थगित करना पड़ा और रिचर्ड बाउचर भी अपनी बात नहीं रख पाए थे।
जब 5 मार्च, 2011 को आयोजित एक सेमिनार जिसमें अरुंधती राय ने भाग लिया था, उसमें न सिर्फ भारत सरकार और संविधान के विरोध में नारे लगाए गए थे बल्कि बांटे गए पर्चे में जूते के तले राष्ट्रीय चिन्ह को दिखाया गया। यही नहीं 30 मार्च, 2011 और 2015 में को भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट विश्वकप के मैच में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए और भारत का समर्थन कर रहे छात्रों पर हमले किये गए। 24 अगस्त, 2011 को अन्ना आंदोलन के समय तिरंगे को फाड़कर पैरों से रौंदा भी गया।
विविधता में एकता भारत की सदियों पुरानी पहचान रही है। भारत में विभिन्न प्रकार के मत-मतान्तरों के बीच जिस प्रकार का सौहार्दपूर्ण सामाजिक तानाबाना देखने को मिलता है, वह शायद पूरी दुनिया में ढूंढने से भी दिखाई नहीं पड़ता। 2014 से पहले तक जेएनयू के कैंपस में इजरायल के किसी व्यक्ति यहां तक कि राजदूत तक का घुसना भी प्रतिबंधित हुआ करता था।

जहां तक वामपंथी विचारधारा की बात है तो न सिर्फ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी बल्कि उत्तर कोरिया, वियतनाम, क्यूबा, चिली, वेनेजुएला या पूर्व सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टियों के किसी सदस्यों ने कभी देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त नहीं पाए गए।
कहा जाता है कि जेएनयू की स्थापना के समय की तत्कालीन इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने अपने अनुकूल बौद्धिक माहौल तैयार करने, अपने वैचारिकता के अनुकूल इतिहास बनाने के लिए जेएनयू की स्थापना की थी। सत्ता पोषित सुविधा सत्तर के दशक की शुरुआत में जब इंदिरा गांधी को विरासत बचाने के लिए वामपंथियों की मदद लेनी पड़ी, वही वो वक्त था जब कम्युनिस्टों ने भी शिक्षण संस्थाओं पर कब्जा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि इंदिरा गांधी के काल में लेफ्ट विचारधारा के लोगों को संस्थान में महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया। लेकिन धीरे धीरे जेएनयू छात्र संगठन की ताकत लगातार बढ़ती गई और इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बार यहां के छात्रों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को परिसर के अंदर भी नहीं आने दिया था और लालकृष्ण आडवाणी को विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर ही रोक दिया था।
तब से लेकर आज तक जेएनयू में वैचारिक प्रतिनिधित्व के नाम पर एक ही विचारधारा का कब्जा रहा है? चाहे कश्मीर का मामला हो या उत्तर-पूर्व में नक्सल-माओवादी क्षेत्रों में सक्रिय हिंसा फैलाने वाले देशद्रोही और अलगाववादी ताकतों को समर्थन देने की, जेएनयू के छात्र संगठन हमेशा ही आगे नजर आते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर जी एन सार्इं बाबा हों या एसएआर गिलानी, खुफिया एजेंसियों ने कई बार इन्हे देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाया।

लेकिन यहां कई साकारात्मक बहसें भी देखा जा सकता है। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही कहा जा सकता है कि यहां समाज में छुपा लिए जाने वाले मुद्दों पर सीमा से आगे बढ़कर बहस की जाती रही है। चाहे वो समलैंगिकता की स्वतंत्रता पर बहस हो या महिलाओं को स्वछंद रहने और काम करने की आजादी का मद्दा यहां हर मुद्दे पर गंभीर बहस का आयोजन देखा जा सकता है।
जब दिल्ली भर में कांग्रेस सरकार की नाक के नीचे सिखों का कत्ल हो रहा था तब जेएनयू ने ही सिखों को शरण दी और देशभर में गुंडागर्दी का पर्याय बन चुकी छात्र राजनीति का शानदार नमूना भी पेश किया। इसी वैचारिक खुलेपन का आड़ लेकर कई बार अतिवादियों ने यहां से अपना एजेंडा भी चलाया। एंटी इस्टैब्लिशमेंट काम करना जेएनयू की परिपाटी रही है। परमाणु ऊर्जा, किसान आत्महत्या, भूमि अधिग्रहण, देश का औद्योगिकरण आदि मुद्दों पर इनका विरोध खुद तक सीमित रहा।

Monday, January 5, 2015

अंधा मोदी विरोध...!

मोदी विरोधी ये पोस्ट कृपया ना पढ़े आपकी देश द्रोही सोच को धक्का लग सकता है...

" मोदी विरोधी ताकते देश है वाकई मेँ कुछ विकास नहीं चाहते "

इसे भारतीय राजनीती की बिडंबना ही कहेंगे की जहाँ जम्मू-कश्मीर जैसे मुस्लिम बहुल राज्य को 80 हजार करोड़ का ऐतिहासिक पैकेज देने वाला "मुस्लिम बिरोधी" बताया जाता है, बिहार को 1.65 लाख करोड़ के विशेष पैकेज देने वाले Narendra Modi को बिहार चुनाव में "बाहरी" करार दिया जाता है।

भ्रस्टाचार से त्रस्त हिंदुस्तान को मात्र डेढ़ सालों में जिसने Corruption Perceptions Index

में चीन से बेहतर स्थिति में खड़ा कर दिया। वैश्विक मंदी के दौर में भी भारत "आर्थिक विकास दर " में चीन को पछाड़ दिया है।

जिस आदमी की सरकार पर इन डेढ़ सालों में "घोटाला" का एक आरोप नहीं है, ताज्जुब होता है की उसके कपड़ों पर भारत में टिप्पणी की जाती है।

मोदीजी के दबँग व्यक्तित्व का ही जलबा है, जहाँ पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री को World Economic Forum के 125 देशों के सर्वे में विश्व के 10 शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में चुना जाता है।

पुतिन और ओबामा सरीखे नेताओं की प्रभवशाली कतार में Times Megazine जिसे शामिल करती है,

कौतुहल है की उसे लोग "कमजोर PM" कहते हैं। बिना किसी पूर्व अनुभव के अकेले दम पर जिसने अन्तराष्ट्रीय राजनीती में भारत का कद बढ़ाया, हिन्दी, गीता और हिंदुस्तान का मान बढ़ाया।

अपनी कूटनीतिक कुशलता से शक्तिशाली चीन को बियतनाम-जापान-भारत के ट्रैंगल-ट्रैप में फँसा दक्षिण चीन सागर में उलझा दिया।

यमन से हजारों भारतियों के सकुशल वापसी का मामला हो या दुबई में दाऊद इब्राहिम की चल-अचल संपत्ति को जब्त करवाने का मामला हो या आगामी ब्रिटेन दौरे में वहाँ भी दाऊद की संपत्ति जब्त करवाने का प्लान बनाना या हजारों करोड़ का Foreign Investments लाना या फिर UN की "स्थायी सदस्य्ता" में प्रबल दावेदारी का Achievement ---पर आश्चर्य की बात की,

हिंदुस्तान में उस आदमी के विदेशी दौरे पर ऊँगली उठाई जाती है।

जिस आदमी ने आम जनता की छोटी-छोटी परेशानी, माताओं-बहनों की समस्या पर काम करना चाहा, जिसने गरीबों को बैंक अकाउंट और इनश्योरेन्स का तोहफा देकर Moral Boostup किया, वहीँ Selfie With Daughter जैसी बात कर बेटियों का मान बढ़ाया।

जो स्कूल में लेडीज टॉयलेट बनबाने का सपना साकार किया, जिसने वाराणसी के एक गाँव को मॉडल गाँव बनाकर नेताओं के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया उसे हिंदुस्तान में "सिर्फ मन की बात" करने वाला कहा जाता है। दशकों से पेंडिग OROP और "नेताजी की गुप्त फाइल" सहित कई मामलों में मोदी साहब को नाकाम दिखाने की कोशिश की गयी पर देर-सबेर उन्होंने जनता की आंक्षाओं पर खड़े उतरे वैसे ही महंगाई- बेरोजगारी - बिजली जैसी समस्याएं भी वे जरूर हल करेंगे।

जनता ने 65 साल सह लिए तो डेढ़ साल में आतुर नहीं हुई है, बस मोदी जी के राजनितिक दुश्मन बेचैन पड़े हैं।

मेहनती इतनी की खुद भी 20 घण्टे काम करते हैं, अकेले दम पर "2014 लोकसभा" सहित महाराष्ट्र, कश्मीर, हरियाणा और झारखण्ड में चुनाव प्रचार कर सफलता के झंडे गाड़े। मोदी साहब का ही जलवा है की दक्षिण भारत जहाँ BJP का कोई नामलेवा नहीं था वहाँ आज "निगम चुनाव" में 40% सीट जीत रही है, और रही बिहार और दिल्ली की बात तो दिल्ली तो नौंटकिक राजनीति भुगत रही हैँ ।

तथा बिहार मे पिछले 60 दिनोँमेँ 578 हत्याये हुयीँ हैँ, बिहार के लोगोँ ने जगंलराज 3 खुद चुना हैँ...

अंधा मोदी विरोध करने वाले Presstitutes मीडिया दरबार और Sickular जान लें की आम जनता अंधी-बहरी नहीं है, आपका सारा खेल देख रही है, समझ रही है।

और आपकी इसी अंधे मोदी विरोध ने मुझ जैसे Natural इन्सान को मोदी भक्त्त भक्त बना दिया।
I Proud To Be "भक्त" ---- मोदी भक्त