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Tuesday, April 26, 2016

क्या धर्म को बदनाम करने के लिए मनुस्मृति के साथ छेड़छाड़ हुई थी...?

असली मनुस्मृति में सिर्फ 630 श्लोक ही थे ,,तो 2400 श्लोक कैसे हो गए किसने मिलावट की....??

चीन की महान दीवार से प्राप्त हुयी पांडुलिपि में ‘पवित्र मनुस्मृति’ का जिक्र, सही मनुस्मृति में 630 श्लोक ही थे,,मिलावटी मनुस्मृति में अब श्लोकों की संख्या 2400 हो गयी

सवाल यह उठता है कि, जब चीन की इस प्राचीन पांडुलिपी में मनुस्मृति में 630 श्लोक बताया है तो आज 2400 श्लोक कैसे हो गयें ? इससे यह स्पष्ट होता है कि, बाद में मनुस्मृति में जानबूझकर षड्यंत्र के तहत अनर्गल तथ्य जोड़े गये जिसका मकसद महान सनातन धर्म को बदनाम करना तथा भारतीय समाज में फूट डालना था।


मनु कहते हैं- जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते। अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। वर्तमान दौर में ‘मनुवाद’ शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है। ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद की रट लगाने वाले लोग मनु अथवा मनुस्मृति के बारे में जानते ही नहीं है या फिर अपने निहित स्वार्थों के लिए मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, जिस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है, उसमें जातिवाद का उल्लेख तक नहीं है। 

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च। (10/65)
महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं।


आखिर जिस मनुस्मृति में कहा गया की जन्म से सब सूद्र ही होते है कर्मो से वो ब्राम्हण,क्षत्रिय,वै­श्य बनते है,जातिवाद नही वर्णवाद नियम था की शूद्र के घर पैदा होने वाला ब्राम्हण बन सकता था,,, सब कर्म आधारित था,,, आज उसको जातिवाद की राजनीती का केंद्र बना दिया गया,,,.

मनुस्मृति और सनातन ग्रंथों में मिलावट उसी समय शुरू हो गयी थी जब भारत में बौद्धों का राज बढ़ा, अगर समयकाल के दृष्टि से देखें तो यह मिलावट का खेल 9 वीं शताब्दी के बाद शुरू हुआ था।

मनुस्मृति पर बौद्धों द्वारा अनेक टीकाएँ भी लिखी गयी थीं। लेकिन जो सबसे ज्यादा मिलावट हुयी वह अंग्रेजों के शासनकाल में ब्रिटिश थिंक टैंक द्वारा करवाई गयीं जिसका लक्ष्य भारतीय समाज को बांटना था। यह ठीक वैसे ही किया ब्रिटिशों ने जैसे उन्होंने भारत में मिकाले ब्रांड शिक्षा प्रणाली लागू की थी। ब्रिटिशों द्वारा करवाई गयी मिलावट काफी विकृत फैलाई।

इसी तरह 9 वीं शताब्दी में मनुस्मृति पर लिखी गयी ‘भास्कर मेघतिथि टीका’ की तुलना में 12 वीं शताब्दी में लिखी गई ‘टीका कुल्लुक भट्ट’ के संस्करण में 170 श्लोक ज्यादा था।

इस चीनी दीवार के बनने का समय लगभग 220 से 206 ईसा पूर्व का है अर्थात लिखने वाले ने कम से कम 220 ईसा पूर्व ही मनु के बारे में अपने हस्तलेख में लिखा।

जानकारी का स्त्रोत :

Manu Dharma shastra : a sociological and historical study, Page No-232 (Motwani K.)

Education in the Emerging India, Page No- 148 (R.P. Pathak)

Friday, April 15, 2016

कथित दलित चिंतक बसपा नेताओं की असलियत, अम्बेडकर जयंती के नाम पर अश्लील डांस का कार्यक्रम

कथित दलित चिंतक बसपा नेताओं की असलियत, अम्बेडकर जयंती के नाम पर अश्लील डांस का कार्यक्रम

अम्बेडकर जयंती के नाम पर रंगारंग कार्यक्रम की प्रस्तुति, अश्लील गानों पर बार बालाओं का नचाया जाए और इस कार्यक्रम में बीएसपी के बड़े-बड़े नेता भी मौजूद हो तो शायद ये ही है कथित दलित चिंतक बसपा नेताओं की असलियत। ये मामला है सीतापुर के महमूदाबाद का, जहां डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की 125 वीं जयंती कुछ इस अमानवीय अंदाज़ में मनाई गई।

उल्लेखनीय है कि बीएसपी हमेशा से ही दलितों के हित और अधिकार की बातें किया करती है, मगर हकीकत कुछ और ही है। भीम राव अम्बेडकर की जयंती कार्यक्रम के दौरान महमूदाबाद में बार बालाओं ने जमकर ठुमके लगाए। उससे भी बड़ी बात कि यह सारा कार्यक्रम बाबा साहेब की मूर्ति के सामने ही चल रहा था। अश्लीलता भरे कार्यक्रम में अश्लील गानों पर बार बालाओं का डांस चल रहा था।
इस कार्यक्रम का आयोजन बीएसपी के नेताओं ने किया था। सबसे पहले रात को बाबा साहेब की मूर्ति पर फूल-मालाएं चढ़ाई गईं। इसके बाद नेताओं ने अम्बेडकर के दिखाए रास्ते पर चलने की कसमें भी खाईं, लेकिन थोड़ी ही देर में कसम वादे फुर्र हो गए। पीछे फिल्मी गीत बजने लगे और अचानक मंच पर बार बालाओं का डांस शुरू हो गया।
बता दें कि यह सब ठीक उसी दिन हो रहा था जब पार्टी सुप्रीमो मायावती ने कार्यकर्ताओं को बताया कि बाबा साहब अम्बेडकर दलितों के भगवान हैं। मायावती ने ये भी कहा था कि दलितों का तीर्थ अयोध्या या काशी नहीं बल्कि बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर पार्क है।

Wednesday, April 13, 2016

कांग्रेस ने बाबा साहेब को भारत रत्न देने से मना कर दिया था ? बीजेपी दिया भारत रत्न...!

आज जो कांग्रेस बाबा साहेब अम्बेडकर को सर पर उठाकर घूम रही है उसने बाबा साहेब को भारत रत्न देने से मना क्यों कर दिया था ? क्यों राजीव गाँधी ने कहा था की अम्बेडकर इतने महान नही है की उन्हें भारत रत्न दिया जाये ?
पढिये ...भारत रत्न असल में कांग्रेस रत्न क्यों बन गया था
जवाहरलाल नेहरू : मृत्यु 1964 में, भारत रत्न 1955 में यानी अपने मौत के पहले ही कामुक नेहरु ने खुद ही खुद को भारत रत्न दिया था ..
* इंदिरा गांधी : मृत्यु 1984 में, भारत रत्न 1971 में इदिरा भी अपने बाप के कदमो पर चलते हुए खुद ही भारत रत्न का पट्टा अपने गले में पहन लिया था
* राजीव ग़ांधी : मृत्यु 1991 में, भारत रत्न 1991 में
ये हाल तो नीच धूर्त कांग्रेसियो का है

वहीं.........दूसरी तरफ इसे देखे .....
* जय प्रकाश नारायण : मृत्यु 1979 में, भारत रत्न 1998 में वो भी तब दिया गया जब अटल बिहारी वाजपेई ही प्रधानमंत्री बने
* बाबा साहब अंबेडकर जी : मृत्यु: 1956 में, भारत रत्न 1990 में ... वो भी जनता दल बीजेपी गठबंधन की सरकार जब केंद्र में आई तब बीजेपी नेता अटल जी के प्रस्ताव पर वीपी सिंह ने बाबा साहेब अम्बेडर को भारत रत्न दिया
* सरदार वल्लभभाई पटेल : मृत्यु 1950 में, भारत रत्न 1991 में ...सरदार पटेल जी को प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने भारत रत्न से नवाजा ..
अब आप खुद विचार करिये की नेहरु ,इन्दिरा और राजीव गाँधी क्या भारत रत्न के लायक हैं ??? क्या ये खुद ये बेशर्मी से मान सकते है की हम भारत रत्न है और खुद को खुद के हाथो ही भारत रत्न से सम्मानित करते है ? इनकी आत्मा ..इनकी जमीर क्या ये नही सोचती की लाल बहादुर शास्त्री, मुंशी प्रेमचन्द्र , बाबा साहेब अम्बेडकर , सरदार पटेल जैसे महान लोगो को अभी तक हमने भारत रत्न क्यों नही दिया ?
और ये तय करने में कितना समय लगा ?? ये भारत रत्न है या "नेहरू रत्न"। जिन गांधी के नाम की ये आज तक रोटी खा रहे है उसे ही भूल गए, दलितों के घर रोटी खाई पर अंबेडकर को भारत रत्न के लायक समझने में 58 साल लगा दिये??
सच्चाई यही है की अगर भारत "कांग्रेस मुक्त" नही हुआ होता और गैर कांग्रेसी लोग प्रधानमंत्री नही बने होते तो सरदार पटेल, बाबा साहेब अम्बेडकर, लोक नायक जयप्रकाश नारायण को कभी भी भारत रत्न नही मिलता

Saturday, March 5, 2016

हम अचानक कब अपने समाज के हितैषी के बदले दूसरे समाज के दुश्मन बन जाते है हमको पता ही नहीं चलता

कभी कभी फेसबुक पर मित्रों के ऐसे "पोस्ट" होते है जो तर्क से हटा हमें गुस्सा दिलाने की कोशिश करते है..!
कई बार हम जिस समाज से आते है या जिसकी हम फ़िक्र करते है चाहे वो हिन्दू हो , मुस्लिम हो , दलित हो , क्रिस्चियन हो या सिख हो – उससे सम्बंधित ऐसी बर्बरता को दिखाई जाती है जिससे हमारा खून खौलने लगता है..!
हम अचानक कब अपने समाज के हितैषी के बदले दूसरे समाज के दुश्मन बन जाते है हमको पता ही नहीं चलता । कब हम एक समाज के रक्षक से दूसरे समाज के भक्षक बन जाता है पता ही नहीं चलता..!
हम युवा नफरत और बदले की आग में इस प्रकार जलने लगते है की कब हम मानवता तक भूल जाते है हमें खुद ही पता नहीं चलता । कई बार हम उन उग्रवादी और कट्टरपंथी संगठनो तक से जुड़ जाते है जो की धार्मिक उन्माद के नाम पर निर्दोष बच्चो तक से हिंसा कराने में नहीं चूकते..!
फिर हम युवा ये भी कहने लगते है उन्होंने भी तो हमारे घर जलाये थे – हमने तो बस जबाब दिया है । लेकिन हम ये भूल जाते है की जबाब उनको नहीं मिलती जिन्होंने ऐसा किया हो बल्कि हजारो निर्दोष बच्चो को , महिलाओ को और बुढो को जिनका इनसे दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता..!
कई बार ऐसे काम पोलिटिकल पार्टी भी करने लगती है , ताकि समाज के बिच तनाव पैदा हो और उसे किसी एक वोट बैंक का लाभ मिले..! नफरत इतनी भर जाती है है की कब हम अपने देश में ही दरार पैदा करने लगते है पता ही नहीं चलता..!
और हम कई बार इन सब के चक्कर में आकर ये तो भूल ही जाते है की हम नफरत में कभी भी किसी समाज , देश या मानवता की भलाई नहीं कर सकते..!
हमारे देश में अनेक भाषा है , अनेक रंग है..!!

Friday, March 4, 2016

वामपंथियों के बारे में बाबा साहेब अंबेडकर के विचार

वामपंथ की छात्र राजनीति जब अपने मंचों से देश की भलाई की बात करती है तो बड़ी सुहावनी लगती है। विद्यार्थी कन्हैया भी समानता वाले समाज की सोच रखता है। गरीबों की भलाई की बात करता है। लेकिन जब भी वामपंथियों को शासन की बागडोर मिली है उन्होंने स्टालिन को दोहराने की कोशिश की है। प्रतिरोध की आवाज उठाने वाले हर गले को रेत दिया है। अभिव्यक्ति की आजादी मांगने वालों ने अपने खिलाफ उठे हर सुर को दबा दिया है। पश्चिम बंगाल का इतिहास तो यही बताता है। 35 साल लेफ्ट पार्टियों ने पश्चिम बंगाल पर शासन किया...और बंगाल की धरती को खून से सान दिया...जरा आंकड़ों पर नजर डालिए...
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2009 में पश्चिम बंगाल की विधानसभा में उस समय के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने खुद बयान दिया था...साल 2009 में 2284 हत्याए हुईं...26 राजनीतिक हत्याएं हुईं...माओवादी गतिविधियों में 134 लोग मारे गए...
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इस बयान के बाद दैनिक स्टेट्समैन कोलकाता में, 16 जुलाई, 2010 को छपी रिपोर्ट पढ़िए..
''A comment on the veracity of these figures is necessary. He has shown political murder as only 26. This figure is suspect. Between 1977 and 1996, the rate of annual political murder on an average was 1473. This figure, giving a 19-year-old trend, cannot suddenly come down to 26. This is a statistical outlier which has to be ignored. In 1997, Buddhadeb Bhattacharjee was severely criticised for admitting such a large figure of political murders. Hence a cautious Home Minister just manipulated the figure which has to be rejected as an outlier.
Anyway to come to a reliable figure of murders between 1997 and 2009, we have taken the annual average of 2284 to come to a total figure of 27,408. Thus between 1977 and 2009 the total number of murder was 28,000 + 27,408 = 55,408. It means an yearly average of 1787, a monthly average of 149 and a daily average of five. In other words, in every four hours and 50 minutes one person was being killed for political reasons in West Bengal. The CPI-M can claim credit that instead of a murder an hour they could limit it to four hour and 50 minutes per murder. What an achievement!''
ये दैनिक स्टेट्समैन की रिपोर्ट है...
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जिस बाबा साहेब अंबेडकर की सामाजिक न्याय प्रणाली की बात वामपंथी कन्हैया कुमार कर रहा है...उन बाबा साहेब अंबेडकर का वामपंथियों के बारे में विचार भी पढ़ लीजिए..
''As regards the labour movement carried on by the Communist Party, there is no possibility of me joining them. I am confirm enemy of the communist, who exploit labour.''
ये वामपंथियों के बारे में बाबा साहेब अंबेडकर के विचार थे। साथी ठीक है कि तुम जेएनयू में बैठकर सामाजिक न्याय की बात करते हो, लेकिन तुम्हारे दल सत्ता में आते ही ऐसा बरताव क्यों करने लगते हैं? तब समतामूलक समाज की अवधारणा दिमाग के कौनसे बंद कोटर में जाकर बैठ जाती है? ठीक है, भारत इसे भी सहन कर लेगा, लेकिन कामरेड तुम अफजल का पाठ पढ़ोगे तो ना जनता सहेगी ना अदालत। तुम्हें बाहर की ज़रा सी हवा क्या लगी पर निकल आए। ठहरो अभी न्याय होने बाकी है। इंतजार करो अदालत के फैसले का

Monday, February 22, 2016

ब्राह्मणवाद से किसको आज़ादी चाहिए। जिसे आने वाली पीढ़ी हरामज़ादी चाहिए।

ब्राह्मणवाद से किसको आज़ादी चाहिए।
जिसे आने वाली पीढ़ी हरामज़ादी चाहिए।
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जो ब्रह्म की साधना से जीवन संजोता है।
मूर्खों!वास्तव में वही तो ब्राह्मण होता है।
ये मिश्रा;शुक्ला ब्राह्मण नहीं नेमप्लेट हैं।
कर्म से विनष्ट हुए कोई भला कैसे श्रेष्ठ है?
हालांकि मानता हूँ के;
आनुवंशिकता इन सबमें सहायक है।
मगर,शेष जातियों में भी;
कई ब्राह्मण कहे जाने के लायक़ हैं।
भूल गए;व्यास की माँ मल्लाह कन्या थीं।
तुलाधर वैश्य की माँ जाति से बनिया थीं।
वाल्मीकि की लूट से जनता बेहाल थी।
जाबाल ॠषि की माताजी चाण्डाल थी।
विश्वामित्र थे तो क्षत्रिय;बने गए थे ब्राह्मण।
अरे!तुम वो तपस्या क्या समझोगे चारण?
तुम्हें तो अपने ही देश की बर्बादी चाहिए।
ब्राह्मणवाद से किसको आज़ादी चाहिए???
जिसे आने वाली पीढ़ी हरामज़ादी चाहिए।
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कर दी है तुमने लोकतंत्र की छीछालेदर।
कमीनीस्ट!देश बेचो;दोगे अपनी ही मातर।
उतनी ही ग़द्दारी फैलाओ;जितनी हो चादर।
के भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी होकर।
ये तो सोचो;माँबेचकर जितने जुटा लो डालर।
काम न आएगी तुमको;विदेशियों की झाँझर।
राष्ट्रवाद से अगर तुमको आज़ादी चाहिए।
तुम्हें देश के हर घर में आतंकवादी चाहिए।
तो सभी ख़ालिदों!तुम्हें मौत से शादी चाहिए।
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