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Saturday, March 5, 2016

CPM यानी तानाशाही-वो भी एक छोटी सी यूनिवर्सिटी में

साल 2012 की बात है। ‪‎JNU‬ में SFI‬ के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार वी.लेनिन कुमार ने राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस की तरफ से प्रणब मुखर्जी की दावेदारी को सीपीएम का समर्थन देने पर विरोध जताया था। अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार सीताराम येचुरी और प्रकाश करात की सीपीएम ने बिना देर किए लेनिन कुमार और चार साथियों को न केवल एसएफआई से बाहर कर दिया बल्कि जेएनयू की एसएफआई यूनिट ही बर्खास्त कर दी। लेनिन कुमार ने एसएफआई-जेएनयू बनाई और चुनाव लड़ा। लेनिन कुमार चुनाव जीत गया। और असल एसएफआई का उम्मीदवार 10वें नंबर पर रहा और उसे 4309 में से सिर्फ 107 वोट मिले। तो ये थी असल एसएफआई की कैंपस में हैसियत और कद लेनिन का बड़ा था। उस वक्त बकौल इंडियनएक्सप्रेस लेनिन ने कहा था-
"fundamental problem with the CPM-SFI" is that the combine now functions like a "dictatorship" with "no room for debate" and represents all that is "unprincipled and undemocratic".
यानी तानाशाही-वो भी एक छोटी सी यूनिवर्सिटी में। लेकिन सवाल लेनिन की जीत का नहीं, सवाल यह कि प्रणव मुखर्जी की दावेदारी का विरोध भर करने पर सीपीएम ने अपने छात्र नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया और वो अभिव्यक्ति की आजादी की बात कर रहे हैं। और सवाल यह भी है कि लेनिन समेत तमाम एसएफआई छात्र नेता प्रणव मुखर्जी को उस वक्त 'दलाल' और कांग्रेस को दलालों, भ्रष्टाचारियों और दलितों-गरीबों को लूटने वालों की पार्टी मानते थे (लेनिन का भाषण सुन लीजिए) लेकिन अब वही कांग्रेस वोट बैंक के लिए लेफ्ट की गोद मे बैठने को तैयार है और लेफ्ट को कांग्रेस में कोई बुराई नहीं दिख रही।
जो कन्हैया अब लेफ्ट पार्टियों का प्रचार करने को तैयार है, वो जेएनयू चुनाव के वक्त लेफ्ट के बाकी धड़ों से भी आजादी चाह रहा था। यकीं न तो उस वक्त के उसके भाषण सुन लीजिए(क्विंट पर बाइट है)। फिर एक सवाल ये भी जेहन में है कि क्या जेएनयू का लेफ्ट एबीवीपी से घबराया हुआु हैं क्योंकि बीते छात्र संघ चुनाव में 14 साल बाद एबीवीपी का एक कैंडिडेट सेंट्रल पैनल में पहुंचा। उपाध्यक्ष पद पर भी एबीवीपी कैंडिडेट दूसरे नंबर पर रहा। महासचिव पर भी एबीवीपी कैंडिडेट दूसरे नंबर पर रहा। यानी लेफ्ट के जितने धड़े जेएनयू में सक्रिय हैं-छात्रों का भरोसा उनसे उठ रहा है।
खैर, लेफ्ट को नया नेता मिल गया है। कॉमरेड कन्हैया अब लेफ्ट को तारेगा तो अच्छा है। लेकिन, अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल बुलंद करे तो फिर लेनिन को बाहर करने का सवाल भी उठेगा ही और उठना भी चाहिए। जो पार्टी अपने छात्र नेताओं को असहमति का हक नहीं देती-वो कैसे अभिव्यक्ति की आजादी की बात करती है। लेनिन का भाषण भी सुन लीजिए।

Friday, March 4, 2016

वामपंथियों के बारे में बाबा साहेब अंबेडकर के विचार

वामपंथ की छात्र राजनीति जब अपने मंचों से देश की भलाई की बात करती है तो बड़ी सुहावनी लगती है। विद्यार्थी कन्हैया भी समानता वाले समाज की सोच रखता है। गरीबों की भलाई की बात करता है। लेकिन जब भी वामपंथियों को शासन की बागडोर मिली है उन्होंने स्टालिन को दोहराने की कोशिश की है। प्रतिरोध की आवाज उठाने वाले हर गले को रेत दिया है। अभिव्यक्ति की आजादी मांगने वालों ने अपने खिलाफ उठे हर सुर को दबा दिया है। पश्चिम बंगाल का इतिहास तो यही बताता है। 35 साल लेफ्ट पार्टियों ने पश्चिम बंगाल पर शासन किया...और बंगाल की धरती को खून से सान दिया...जरा आंकड़ों पर नजर डालिए...
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2009 में पश्चिम बंगाल की विधानसभा में उस समय के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने खुद बयान दिया था...साल 2009 में 2284 हत्याए हुईं...26 राजनीतिक हत्याएं हुईं...माओवादी गतिविधियों में 134 लोग मारे गए...
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इस बयान के बाद दैनिक स्टेट्समैन कोलकाता में, 16 जुलाई, 2010 को छपी रिपोर्ट पढ़िए..
''A comment on the veracity of these figures is necessary. He has shown political murder as only 26. This figure is suspect. Between 1977 and 1996, the rate of annual political murder on an average was 1473. This figure, giving a 19-year-old trend, cannot suddenly come down to 26. This is a statistical outlier which has to be ignored. In 1997, Buddhadeb Bhattacharjee was severely criticised for admitting such a large figure of political murders. Hence a cautious Home Minister just manipulated the figure which has to be rejected as an outlier.
Anyway to come to a reliable figure of murders between 1997 and 2009, we have taken the annual average of 2284 to come to a total figure of 27,408. Thus between 1977 and 2009 the total number of murder was 28,000 + 27,408 = 55,408. It means an yearly average of 1787, a monthly average of 149 and a daily average of five. In other words, in every four hours and 50 minutes one person was being killed for political reasons in West Bengal. The CPI-M can claim credit that instead of a murder an hour they could limit it to four hour and 50 minutes per murder. What an achievement!''
ये दैनिक स्टेट्समैन की रिपोर्ट है...
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जिस बाबा साहेब अंबेडकर की सामाजिक न्याय प्रणाली की बात वामपंथी कन्हैया कुमार कर रहा है...उन बाबा साहेब अंबेडकर का वामपंथियों के बारे में विचार भी पढ़ लीजिए..
''As regards the labour movement carried on by the Communist Party, there is no possibility of me joining them. I am confirm enemy of the communist, who exploit labour.''
ये वामपंथियों के बारे में बाबा साहेब अंबेडकर के विचार थे। साथी ठीक है कि तुम जेएनयू में बैठकर सामाजिक न्याय की बात करते हो, लेकिन तुम्हारे दल सत्ता में आते ही ऐसा बरताव क्यों करने लगते हैं? तब समतामूलक समाज की अवधारणा दिमाग के कौनसे बंद कोटर में जाकर बैठ जाती है? ठीक है, भारत इसे भी सहन कर लेगा, लेकिन कामरेड तुम अफजल का पाठ पढ़ोगे तो ना जनता सहेगी ना अदालत। तुम्हें बाहर की ज़रा सी हवा क्या लगी पर निकल आए। ठहरो अभी न्याय होने बाकी है। इंतजार करो अदालत के फैसले का

Wednesday, February 17, 2016

जेएनयू के गद्दार रामा नागा के पिता चूड़ी बेचते हैं और उसकी मां मजदूरी करती है तो क्या इसीलिए उसे गद्दारी की छुट है?

कन्हैय्या कुमार का बाप पैरालाइज़्ड है और कई सालों से बिस्तर पर है, माँ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता है जहाँ उसे 3000 रूपये महीने की तनख्वाह मिलती है, एक भाई और है जो आईएएस की तैयारी कर रहा है। कन्हैया कुमार की उम्र लगभग 30 वर्ष है और वो जेएनयू में पीएचडी कर रहा है। कन्हैया कुमार बिहार के जिस इलाके का रहने वाला है वो बहुत पिछड़ा इलाका है और वहां हमेशा सीपीआई और सीपीआई माले का बोलबाला रहा है। अब सवाल ये उठता है कि जिस बेटे की माँ दिन रात मेहनत करके 3000 रूपये महीने कमाती हो उसका लड़का 30 साल की उम्र तक पढाई करेगा? दूसरा सवाल, जिसके क्षेत्र का विकास कम्युनिस्टों के रहते (या उनके कारण) नहीं हो पाया क्या वो उन्ही का फेवर करेगा? तीसरा सवाल, क्या एक गरीब दलित इतने महंगे वकील हायर कर सकेगा? और मजे की बात सुनिए, जिस लड़के को घर में इतनी परेशानियां हैं उसका आदर्श है, एक हार हुआ नौजवान जिसने आत्महत्या कर ली थी, और शर्मनाक बात ये है कि हमारे देश का मीडिया उसे हीरो बना रहा है, रविश कुमार जैसे सीरियस पत्रकार उसकी शान में कसीदे पढ़ रहे हैं।
रविश कुमार के अनुसार जेएनयू के गद्दार रामा नागा के पिता चूड़ी बेचते हैं और उसकी मां मजदूरी करती है
तो क्या इसीलिए उसे गद्दारी की छुट है?