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Wednesday, June 1, 2016

आरएसएस के स्कूल में पढ़ने वाला मुस्लिम छात्र बना असम का टॉपर


आरएसएस के स्कूल में पढ़ने वाला मुस्लिम छात्र बना असम का टॉपर


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असम में 10th बोर्ड का रिजल्ट मंगलवार को घोषित किया गया। सरफराज हुसैन ने राज्य में टॉप किया है। उसे इस एग्जाम में 600 में 590 नंबर मिले हैं। सबसे खास बात यह है कि वह आरएसएस की मदद से चलने वाले स्कूल का स्टूडेंट है। इसके अलावा अपनी कम्युनिटी से टॉप करने वाला इकलौता स्टूडेंट है। बता दें कि 10th बोर्ड में करीब 4 लाख स्टूडेंट्स ने एग्जाम दिया था।

सरफराज के मुताबिक- ‘मुझे यह जरूर लगता था कि मैं टॉप 10 में जगह बना लूंगा लेकिन यह कभी नहीं सोचा था कि पूरे राज्य में टॉप करूंगा। मैं इस एचिवमेंट के लिए अपने गुरु, फैमिली का आभारी हूं। मैं आगे इंजीनियर की पढ़ाई करता चाहता हूं। बता दें कि सरफराज के पिता गुवाहटी में वेटर का काम करते हैं।
स्टेट बोर्ड में टॉप करने वाला सरफराज आरएसएस की मदद से चलने वाले स्कूल विद्या भारती के शंकरदेव शिशु निकेतन का स्टूडेंट है।गुवाहाटी के बेटकुची इलाके के इस स्कूल में करीब 24 मुस्लिम स्टूडेंट्स हैं। सरफराज का यह एचीवमेंट इसलिए और अहम माना जा रहा है कि कुछ और स्टूडेंट्स को इतने ही नंबर मिले हैं। लेकिन वह ऐसा अकेला स्टूडेंट है, जो मुस्लिम कम्युनिटी से है।


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Sunday, May 29, 2016

मोदी सरकार को बदनाम करने की साजिश का खुलासा

 मोदी सरकार को बदनाम करने की साजिश का खुलासा






प्रवीन का कहना है दीपक कुमार आम आदमी पार्टी के कार्यकर्त्ता हैं | प्रवीन ने दीपक के कुछ फोटो भी शेयर किये हैं |









मोदी सरकार की 50 बड़ी योजनायें,जिनका लाभ सीधा जनता को मिल रहा है #अच्छेदिन

मोदी सरकार की 50 बड़ी योजनायें,जिनका लाभ सीधा जनता को मिल रहा है




*मोदी सरकर के दो साल का रिपोर्ट कार्ड खुद पढ़िए लोगो को भी पढ़ाइये*
दो साल में अनेको योजनाओं की शुरुआत की गयी है जिनका लाभ सीधा भारत की जनता को मिल रहा है।
*1-प्रधानमंत्री जन धन योजना*
*2-प्रधानमंत्री आवास योजना**
*3-प्रधानमंत्री सुकन्या समृद्धि योजना*
*4-प्रधानमंत्री मुद्रा योजना*
*5-प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना*
*6-प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना*
*7-अटल पेंशन योजना*
*8-सांसद आदर्श ग्राम योजना*
*9-प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना*
*10-
प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना*
*11-प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजनाये*
*12-प्रधानमंत्री जन औषधि योजना*
*13-मेक इन इंडिया*
*14-स्वच्छ भारत अभियान*
*15-किसान विकास पत्र*
*16-सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम*
*17-डिजिटल इंडिया*
*18-स्किल इंडिया*
*18-बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना*
*20-मिशन इन्द्रधनुष*
*21-दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना*
*22-दीन दयाल उपाध्याय* *ग्रामीण 23-कौशल्या योजना*
*24-पंडित दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते योजना*
*25-अटल इनोवेशन मिशन फंड
* 26-अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत योजना)*
*27-स्वदेश दर्शन योजना*
*28-पिल्ग्रिमेज रेजुवेनशन एंड स्पिरिचुअल ऑग्मेंटशन ड्राइव (प्रसाद योजना)*
*29-नेशनल हेरिटेज सिटी डेवलपमेंट एंड ऑग्मेंटशन योजना (ह्रदय योजना)*
*30-उड़ान स्कीम*
*31-नेशनल बाल स्वछता मिशन*
*32-वन रैंक वन पेंशन (OROP) स्कीम*
*33-स्मार्ट सिटी मिशन*
*34-गोल्ड मोनेटाईजेशन स्कीम*
*35-स्टार्टअप इंडिया, स्टन्डप इंडिया*
*36-डिजिलोकर*
*37-इंटीग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम*
*38-श्यामा प्रसाद मुखेर्जी* *रुर्बन मिशन*
*सागरमाला प्रोजेक्ट*
*39-‘प्रकाश पथ’ – ‘वे टू लाइट’*
*40-उज्वल डिस्कॉम असुरन्स योजना*
*विकल्प स्कीम*
*41-नेशनल स्पोर्ट्स टैलेंट सर्च स्कीम*
*42-राष्ट्रीय गोकुल मिशन*
*43-पहल – डायरेक्ट बेनिफिट्स ट्रांसफर फॉर LPG (DBTL) कंस्यूमर्स स्कीम*
*44-नेशनल इंस्टीटूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (नीति आयोग)*
*45-प्रधानमंत्र खनिज क्षेत्र कल्याण योजना*
*46-नमामि गंगे प्रोजेक्ट*
*47-सेतु भारतं प्रोजेक्ट*
*48-रियल एस्टेट बिल*
*49-आधार बिल*
*50-क्लीन माय कोच*
*51-राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान – Proposed*
*52-
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना*
★ 1भी घोटाला मोदी सरकार के किसी मंत्री ने किया नही है। और सबसे महत्वपूर्ण है की 2 साल में पारदर्शी एडमिनिस्ट्रेशन दिया।
★ ना पैसा लिया ना लेने दिया जो चरितार्थ करता है की, "ना खाऊंगा ना खाने दूंगा।"

★ कई ऐसे घोटाले जो की UPA के समय में बाहर नही आये थे वो अब बाहर आ रहे है।
★ CBI, IB, NIA को स्वायत्त रूप से काम करने की छुट दी गई है।
★ प्रमाणिक और विद्वान रक्षा मंत्री पाकर भारतीय आर्मी का मोरल सबसे ऊपर है।
★युवा और महिलाओ की क्षमता को पहचाना और देश के विकास में उनकी सहभागीता बढ़ाने का अभिनव प्रयास किया।
★ भारतीय योग को विश्व में पहचान दिलाई और आयुष मंत्रालय द्वारा हमारे प्राचीन औषधीय वनस्पति शास्त्र को नई वैश्विक पहचान दी।
●●●●फरवर्ड कीजिये दोस्तों आइये इसे पापियो के मुह पर चिपकाए और एक सच्चे भारतीय का हौसला बढ़ाये।

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Saturday, May 28, 2016

जिन्होंने देश को लूटा, वे हमारी सरकार को पसंद नहीं करते : मोदी


जिन्होंने देश को लूटा, वे हमारी सरकार को पसंद नहीं करते : मोदी



नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि राजग के दो साल के कार्यकाल में अब तक 37 हजार करोड़ रुपए का भ्रष्टाचार रुका है। ये सिर्फ दो साल के लिए नहीं है, ये हर साल बचेगा। उन्होंने कहा कि दो साल बाद सरकार में नया विश्वास पैदा हुआ है। पिछली सरकार भ्रष्टाचार से संक्रमित थी, लेकिन हमारे सत्ता में आने के बाद इसको खत्म करने पर जोर दिया गया। उन्होंने कहा कि पिछली और मौजूदा सरकार के काम को परखेंगे तो पता चलेगा कि बदलाव कितना बड़ा हुआ है।

मोदी सरकार के दो साल पूरे होने के मौके पर नई दिल्ली के इंडिया गेट पर आयोजित कार्यक्रम नई सुबह में उन्होंने कहा कि लोग अब कहते हैं कि इतना काम करने के बाद भी विरोध क्यों होता है। उन्होंने कहा कि जिनकी जेब में 36000 करोड़ जाता था, जो रोक दिया गया वह मोदी को गाली नहीं देगा तो क्या देगा।

उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बहुत ही व्यवस्थित तरीके से एक के बाद एक कदम उठाया गया है। उन्होंने कहा कि पहले की सरकार में क्या हुआ और आज क्या हुआ इसकी तुलना जरूरी है। दो साल पहले तक पूर्व की सरकार भ्रष्टाचार के खबरों से घिरी हुई थी।

मोदी ने कहा, मुद्दों के आधार पर तथ्यों के आधार पर हर काम का कठोरता से मूल्यांकन लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, लेकिन कहीं हम ऐसी गलती न कर दें जो बिना कारण देश को निराशा की गर्त में धकेलने का प्रयास करे। मोदी ने कहा कि
एलईडी बल्ब के कारण देश में 20 हजार मेगावाट बिजली की बचत हुई है। एलईडी बल्ब की कीमत घटकर 60-70 रुपए तक आ गई है।

उन्होंने कहा कि फर्जी केरोसीन तेल लेने वालों के नाम सामने आए, अकेले एक राज्य से इस ओर कई सौ करोड़ रुपए बचा। फर्जी टीचर पर वेतन के लिए पैसे जाते थे। हमने अब तक एक करोड़ 62 लाख फर्जी राशन कार्ड का पता लगाया। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम से भ्रष्टाचार खत्म हुआ।

उन्होंने कहा कि अकेले रसोई गैस में इतने फर्जी नाम निकले कि करीब करीब 15 हजार करोड़ रुपया बचा लिया गया। मोदी ने कहा कि देश को भ्रष्टाचार ने दीमक की तरह भीतर से खोखला कर दिया।



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जो कहते हैं मोदी ने कुछ नहीं किया वो खबर पढ़कर शर्म से डूब मरेंगे


जो कहते हैं मोदी ने कुछ नहीं किया वो खबर पढ़कर शर्म से डूब मरेंगे

प्रधानमंत्री मोदी ने आज इंडिया गेट से एक नयी सुबह के कार्यक्रम में देशवासियों को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने बहुत की बारीकी से देशवासियों को अपने कामकाज से रूबरू कराया। कुछ लोग जो कह रहे हैं कि मोदी से दो वर्षों में कुछ नहीं किया वो लोग इस खबर को पढ़कर शर्म से डूब मरेंगे। खासकर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेता देश में नकारात्मकता फैलाने के लिए कह रहे हैं कि मोदी ने दो वर्षों में कुछ नहीं किया। आज मोदी ने बहुत ही इत्मीनान से बताया कि उन्होंने दो वर्षों में क्या किया है और उनके कामकाज से देश कैसे बदल रहा है, देश कैसे आगे बढ़ रहा है।
मोदी ने कहा कि जनता जनार्दन के हमपर दिनों दिन आशीर्वाद बढ़ते जा रहे हैं तो हमारे काम का उत्साह भी बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि मै उन लोगों के लिए कुछ नहीं कह सकता जिसका राजनीतिक रूप से विरोध करना अनिवार्य होता है। उन्होंने कहा कि उनका विरोध करना स्वाभाविक भी है और लोकतंत्र में ऐसी बातें चलती रहती हैं।
उन्होंने कहा कि देश ने पिछले 15 दिन में दो बातें स्पष्ट देखी हैं – एक तरफ विकासवाद है तो दूसरी तरफ विरोधवाद है, विकासवाद और विरोधवाद के बीच में जनता जनार्दन दूध का दूध और पानी का पानी करके क्या सत्य है और कितना सत्य है इसको भली भाँती नाप सकती है।
मोदी ने कहा कि विरोध की अनेक बातें हो रही हैं जिन्हें वे दोहराना नहीं चाहते लेकिन चिंता इस बात की जरूर होती है कि मुद्दों के आधार पर, हकीकतों के आधार पर, हर काम का कठोर तरीके से मूल्यांकन होना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है लेकिन कहीं हम ऐसी गलती ना कर दें जो देश को बिना कारण निराशा की गर्त में धकेलने का प्रयास करती है।
उन्होंने कहा कि कहीं कहीं पर ये बातें सामने आती हैं जिनमें हकीकतों का कोई आधार नहीं होता है, लेकिन उसपर इस प्रकार की स्थितियां सवार हो जाँय, ये कभी कभी चिंता पैदा करती हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार के कामकाज का लेखा जोखा पुरानी सरकारों के कामकाज के सन्दर्भ में होता है, पहले क्या होता था, अब क्या हो रहा है, इसका तुलनात्मक अध्ययन होता है, अगर हम बीती हुई सरकारों की बातों को भुला दें और अचानक ही चीजों की चर्चा शुरू कर दें तो सही मूल्यांकन नहीं हो सकता।
कोयले की समस्या से देश को बाहर निकालना छोटा काम नहीं था: मोदी
उन्होंने कहा कि अगर हम यह कहें कि हमने कोयले की समस्या को हल कर दिया। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर अचानक ही सुप्रीम कोर्ट कोयले की खदानों के लाइसेंस रद्द कर दे और बिजली के कारखानों में कोयले का संकट पैदा हो जाय तो क्या होगा।
उन्होंने कहा कि ऐसी घटना जिसमें पूरी सरकार जो कोयले के भ्रष्टाचार के कारण बदनामी भुगत चुकी हो, दो वर्ष पहले कोई अख़बार, कोई टीवी, कोई चैनल, कोई चर्चा, कोई भाषण और कोई दिन ऐसा नहीं था जिसमें भ्रष्टाचार की बातें ना बोली जाती हों।
उन्होंने कहा कि हमने कोयले की पारदर्शी तरीके से नीलामी की, अब तक इसपर कोई सवालिया निशान नही लगा है, देश के खजाने में लाखों करोड़ रुपये आना तय है, राज्यों के खजाने में भी पैसा जा रहा है, इसके अलावा कोयले की खदानों के आसपास गरीब आदिवासी रहते हैं, उनके कल्याण के लिए फण्ड निकलने वाला है। उन्होंने कहा कि यह सभी बातें अगर मै ऐसे ही कह दूँ तो लगता है कि चलो भाई मोदी ने यह काम कर दिया लेकिन इसकी ताकत तब समझ में आती है जब आप सोचते हैं कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसा क्यों करना पड़ा था, कोयले में इतना बड़ा भ्रष्टाचार क्यों हुआ था, वो कौन से तरीके थे जिसमें जमकर लूट हुई थी और उसमें से देश को बाहर लाना, तब जाकर समझ में आता है कि काम कितना बड़ा हुआ है, काम कितना महत्वपूर्ण हुआ है।
हमने भ्रष्टाचार के दीमक को ख़त्म कर दिया: मोदी
उन्होंने कहा कि जब तक हम बीती हुई सरकार के दिनों को स्मरण करके वर्तमान के निर्णयों को परखेंगे तो हमें ध्यान आएगा कि बदलाव कितना बड़ा आया है। इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि दीमक की तरह भ्रष्टाचार ने इस देश को अन्दर से खोखला कर दिया है, तबाह कर दिया है, हमारे हर सपने को चूर चूर करने की ताकत अगर किसी दीमक में है तो उसका नाम भ्रष्टाचार है।
मोदी ने कहा कि मैंने भ्रष्टाचार के खिलाफ बहुत ही सटीक तरीके से एक के बाद एक कदम उठाकर हिन्दुस्तान के जन मन को आंदोलित करने वाला ठोस प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि जब आप इनकी गहराई में जाओगे तो चौंक जाओगे।
जो बेटियां पैदा भी नहीं होती थी उसे विधवा बनाकर पेंशन दिया जाता था
मोदी ने कहा कि आप कल्पना कर सकते हो कि देश कैसे चला है, वो बेटी जो कभी पैदा भी नहीं हुई है, देश की सरकारों की फाइलों में वह बेटी विधवा भी हो जाती है और उस विधवा बेटी को पेंशन भी मिलना शुरू हो जाती है और उसे वर्षों तक पेंशन मिलती रहती है। उन्होंने कहा कि कभी ऐसे भ्रष्टाचारों की चर्चा भी नहीं होती।
फर्जी गैस कनेक्शन ख़त्म करके 15 हजार करोड़ रुपये बचाए
उन्होंने कहा कि हमने जब डायरेक्ट बेनिफिट ट्रान्सफर (DBT) के अंतर्गत रसोई गैस की सब्सिडी डायरेक्ट पहुँचाना शुरू किया, उसे जनधन और आधार कार्ड से लिंक किया तो बहुत ही गहरा राज सामने आया। उन्होंने कहा कि देशवासियों को जानकार हैरानी होगी कि अकेले रसोई गैस में इतने फर्जी नाम मिले, इतने फर्जी सिलेंडर दिए गए कि सुनकर पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। उन्होंने कहा कि जब हमने इन फर्जीवाड़े को ख़त्म किया तो करीब करीब 15 हजार करोड़ रूपया, जिसपर आपका हक था उसे हमने बचा लिया।

मोदी ने कहा कि अगर किसी के यहाँ रेड हो जाय और उसके यहाँ से 50 करोड़ रुपये भी मिल जाँय तो सभी अख़बारों में बड़ी हेडलाइन बन जाती है लेकिन हमने बड़ी मेहनत करके और योजना बनाकर देश के 15 हजार करोड़ बचा लिए जिसे देखकर मेरा देश कहेगा कि मोदी आपने सही काम किया।
मोदी ने कहा कि आपको हैरानी होगी कि राशन कार्ड जिससे गरीबों के लिए सस्ते में अनाज मिलता है, कैरोसीन आयल मिलना है, उसकी थाली में जब चावल जाता है तो एक किलो पर 27 रूपया भारत सरकार के खजाने से जाता है और एक रुपये प्रति किलो उससे लिया जाता है लेकिन उस गरीब को यह बात पता नहीं है कि केंद्र सरकार उसके एक किलो चावल पर 27 रुपये खर्च कर रही है।
 मोदी ने कहा कि अभी मेरा काम चल रहा है लेकिन जितना हुआ है अबतक, 1 करोड़ 62 लाख से भी ज्यादा फर्जी राशन कार्ड हमने खोजकर निकाले हैं। उन्होंने कहा कि उन राशन कार्डों पर जो भी राशन जाता था वह किसी के घर तो जाता था, कहीं तो बेईमानी होती थी, उन्होंने बताया कि हरियाणा सरकार ने एक DBT योजना के तहत एक मुहिम चलाई, मुझे बताया गया कि हरियाणा में फर्जी केरोसिन लेने वालों की संख्या 6 लाख निकली। इन 6 लाख लोगों के नाम पर सब्सिडी वाला केरोसिन जाता था, वो कैरोसिन कहाँ जाता होगा, डीजल में मिक्स करने के लिए जाता होगा, प्रदुषण करने के लिए जाता होगा, किसी केमिकल फैक्ट्री में जाता होगा। सरकार के खजाने से हजारों करोड़ रुपये गरीब के नाम से लूट लिया जाता होगा।
मोदी ने बताया कि 6 लाख केरोसिन कार्ड, 1 करोड़ 62 लाख राशन कार्ड फर्जी मिले हैं, अभी हमने इसी योजना के तहत एक राज्य में 540 करोड़ रुपये बचाए हैं, वहां पर फर्जी टीचर के नाम पर 1 हजार करोड़ रुपये की लूट रुक गयी है। ये भ्रष्टाचार हो रहा था लेकिन अब रुक गया है।
मोदी ने कहा कि हजारों करोड़ रूपया केवल एक वर्ष नहीं बल्कि हर वर्ष बचने वाला है। अभी तो यह शुरुआत है, एक नयी सुबह है, आगे तो बहुत कुछ होना है।
मोदी ने बताया कि कुछ लोग मुझसे कहते हैं, मुझे बहुत समझाते हैं कि मोदी जी आप इतना मेहनत करते हैं, काम में लगे रहते हैं तो रोज आपका विरोध क्यों होता रहता है, इतना तूफ़ान क्यों चलता रहता है, आप अपना कोई संपर्क नीति बनाओ, मीडिया से बात करो, अब ऐसे लोगों को मै कैसे समझाऊं कि भाई जिन लोगों की जेब में 36 हजार करोड़ रुपये जाता है उसे मोदी ने बंद करवा दिया तो मोदी गाली नहीं खाएगा तो क्या खाएगा।
मोदी ने कहा कि लूट चलाने वालों को कैसी कैसी परेशानियां होती होंगी इसका अंदाजा हम भली भाँती कर सकते हैं। मै कई ऐसे विषय बताता हूँ जिसमें हमने सटीक तरीके से काम किये हैं जिसका हमें आज परिणाम देखने को मिला है।
उन्होंने कहा कि आप देखिये, पहले LED Bulb कितने रुपये में मिलता था, आज कितने रुपये में मिलता है, कहीं पर 200, 300, 350 रुपये LED की कीमत थी लेकिन आज वह 60, 70, 80 रुपये में आ गया है।
उन्होंने कहा कि अगर हम किसी स्थान पर बिजली का कारखाना लगाएं और हम घोषणा करें कि 2 लाख करोड़ के बिजली के कारखाने लगेंगे, इस घोषणा को करने के बाद हमारे देश के सभी अखबार इसे हेडलाइन बनाएंगे कि मोदी ने बहुत भारी सपना देखा है कि दो लाख करोड़ के बिजली के कारखाने लगायेंगे। कोई यह भी लिखेगा कि मोदी बातें करता है लेकिन रुपये कहाँ से आयेंगे। ऐसी बहुत सी बातें हो सकती हैं लेकिन इस बात की चर्चा नहीं होगी कि LED बल्ब के अभियान के कारण जिन पांच सौ शहरों को हमने टारगेट किया है, अगर हम शत प्रतिशत LED पहुँचाने में सफल हो जाएंगे और हम सफल होने भी वाले हैं, जिन दिन भी यह काम पूरा होगा इस देश में करीबी करीब 20000 मेगावाट की बिजली बचने वाली है जिसका मतलब यह हुआ कि एक लाख करोड़ की बिजली बच जाएगी, मतलब देश का 1 लाख करोड़ रूपया जो बिजली का कारखाना लगाने में खर्च होना था वह बच गया।
उन्होने कहा कि 60-70 रुपये का LED बल्ब क्या कोई न्यूज का विषय हो सकता है क्या, उसमे क्या खबर है जी, न्यूज चैनल नहीं दिखाएगा। उन्होंने कहा कि हम लोग जो तेज गति से बदलाव ला रहे हैं, उसे यह देश अनुभव कर रहा है।
मोदी ने कहा कि पिछले चुनावों में एक चर्चा होती रहती थी कि गैस सिलेंडर 12 होने चाहियें कि 9 होने चाहियें, बड़े बड़े नेता घोषणा करते थे और अख़बारों में हेडलाइन बनती थी कि अब 9 की जगह 12 सिलेंडर दिए जाएंगे। ये नेता 9 सिलेंडर से 12 सिलेंडर करने के वोट मांगते थे। उन दिनों को याद कीजिये जब सांसदों को गैस सिलेंडरों के 25 कूपन मिलते थे और वो 25 कूपन से अपने साथियों और कार्यकर्ताओं को खुश करता था।
उन्होंने कहा कि जिस देश में सांसदों को गैस सिलेंडरों के 25 के मिलते थे उस देश के लोगों से हमने रसोई गैस की सब्सिडी छोड़ने का आग्रह किया और करीब करीब 1 करोड़ 13 लाख लोगों ने गैस सब्सिडी छोड़ दी।
हमने तय किया है कि आने वाले तीन वर्षों में हम पांच करोड़ लोगों को फ्री गैस कनेक्शन दे देंगे, हमने पिछले वर्ष 3 करोड़ लोगों गैस कनेक्शन दे दिया। जहाँ सांसदों को केवल 25 गैस सिलेंडरों के कूपन मिलते थे और उसे बहुत गर्व होता था उसी देश में हम 5 करोड़ लोगों को फ्री गैस कनेक्शन देने का ऐलान किया है।
मोदी ने कहा कि अगर हमारी पिछली सरकार की तुलना में स्पीड देखी जाय, स्केल देखा जाय, काम करने का ढंग देखा जाय, टार्गेटेड ग्रुप देखा जाय तो समझ में आएगा कि हमने कितना काम किया है और देश में कितना बदलाव आ रहा है।
वीडियो देखें



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Thursday, May 19, 2016

तो क्या इस वजह से “बरखा दत्त” मोदी के खिलाफ बोलती है!



 तो क्या इस वजह से “बरखा दत्त” मोदी के खिलाफ बोलती है!





पत्रकार का धर्म होता है वह खबरों को प्रकाशित करें और उनका असली स्वरूप  दिखाये मगर आजकल पत्रकार अपने पत्रकारिता से कम और खुद की ही शक्सियत से सुखिया बनने के लिए ज्यादा जाने जाते हैं |बरखा दत्त भारतीय मीडिया का एक मशहूर नाम जो हमेशा सुर्ख़ियो में रहता है, कभी मोदी विरोधी खबरों के लिए तो कभी धर्म के नाम पर भेद भाव करने के लिए!छोटे समय के लिए लोकप्रियता हासिल करके बरखा दत्त ने यह भी साफ कर दिया है आने वाले समय में उनकी कोई भी रिपोर्ट निष्पक्ष नहीं रह कर मोदी विरोधी ही रहा करेगी |
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इस 3 मिनट की वीडियो को देखिये, आपको पता चल जायेगा की क्यों बरखा दत्त मोदी विरोधी है!
ज्ञात हो की बरखा दत्त ने JNU मसले पर भी कन्हैया को हीरो बनाने में कोई कसर बाकि नहीं छोड़ी थी, और आज सच सबके सामने है, जाँच में पाया गया की JNU में देशविरोधी नारे लगे थे और 4 वीडियो सही पाये गए है जिनके साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं की गई थी फिर भी बरखा दत्त की हिम्मत तो देखो क्या बढ़ चढ़ कर बोल रही है.मोदी के खिलाफ तो ये शुरू से ही थी.
सुर्खिया बटोरने के लिए ये पत्रकार अपनी गरिमा भूल कर कुछ भी करने को तैयार रहते है. 

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Monday, April 4, 2016

संघ अपना प्रचार नहीं करता, उनके कार्य स्वयं प्रचार करते हैं...!



देखा की बंगाल में जो पुल गिरा उसमे सेवा कार्य कर रहे स्वयंसेवकों पर कुछ तथाकथित सेक्युलर लोग और विरोधी सवाल उठा रहे है.. कोई कह रहा है की इन लोगों को नेकर पहनने का समय कैसे मिल गया.. कोई कह रहा है की ये लोग सर्फ फ़ोटो खिंचवाते है..
दोस्तों आपको शोभा नहीं देता घर में बैठे बैठे इतना ज्ञान देना.. जो लोग कभी माँ के द्वारा कहे काम भी नहीं करते वो लोग बुद्धिजीवी बन यहाँ संघ के सेवा कार्यों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे है.. वैसे इन लोगों के प्रश्न चिन्ह खड़ा करने या विरोध करने से कोई फर्क नहीं पड़ता.. क्योकि संघ कर्मप्रधान संघठन है.. हम विरोधियों के विधवा प्रलाप नहीं सुनते..
तो बात आती है नेकर पहनने की तो मित्रों वहां काम करने वाले लोग एक संघठन के नाते काम कर रहे है न की व्यक्तिगत रूप से.. अगर कोई विशिष्ट पहचान नहीं होगी तो क्या एक दूसरे को पहचान पाना संभव होगा की कौन है अपने संघठन का जो यहाँ कार्य करने आया है.. क्या काम करवाना है.. देखिएगा कभी.. पुलिस वाले जहाँ जनसाधारण को नहीं जाने देते वहां भी नेकर पहने व्यक्ति को देख कर जाने देते है.. और सोचिये कोई फौजी भाई छुट्टियों पर घर आया है.. साधारण वेश में घर में है और अचानक बुलावा आता है की जंग छिड़ गयी है तुरंत पहुँचो.. क्या वो फौजी उसी साधारण वेश में युद्धभूमि में जाएगा?? नहीं न! अब इसे संघ और उसकी गणवेश से जोड़ कर देखो..
और बात आई फ़ोटो लेने की तो.. दोस्तों लोग तो सामने मरते हुए उस व्यक्ति की भी फ़ोटो लेते है जिसे सहजता से अस्पताल लेजाकर बचाया जा सकता है. लेकिन अगर संघ वालों ने 2-4 फ़ोटो ले भी लिए तो क्या मुसीबत आन पड़ी? मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ जरुरी नहीं वो फोटो वहां कार्य कर रहे स्वयंसेवकों ने ही लिए हो.. उन्हें आप या मेरा जैसा कोई व्यक्ति ले कर भी फेसबुक पर डाल सकता है.. हो सकता है कोई संघ पृष्ठभूमि का पत्रकार रहा हो फ़ोटो लेने वाला.. यार फ़ोटो लेना किस दृष्टिकोण से गलत है? वो काम कर रहे है तो फ़ोटो डाल दी तो क्या हो गया? आप काम नहीं कर सकते आपको कोई कह भी नहीं रहा काम करो.. पर जो कर रहा है कम से कम उसकी टांग तो न खींचो..
और संघ प्रचार नहीं करता अपने कार्यों का कभी भी.. पर अगर दो- तीन फ़ोटो डाल भी दे तो इस से पहाड़ नहीं टूट पड़ा.. या इस से उनके कार्यों का महत्व कम नहीं हो गया..

लोग भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति का विरोध तो खूब करते हैं लेकिन अपनी मज़हबी मान्यताओं की बखिया उधेड़े जाने पर बिलबिलाने लगते

जो मज़हबी लोग भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति का विरोध तो खूब करते हैं लेकिन अपनी मज़हबी मान्यताओं की बखिया उधेड़े जाने पर बिलबिलाने लगते हैं और कुतर्कों की झड़ी लगा देते हैं, उन्हें साम्प्रदायिक राजनैतिक इतिहास के आईने में अपना चेहरा भी देख लेना चाहिये.. शायद सन् 85 या 86 की बात है, एक बूढ़ी औरत शाहबानों को तलाक़ तलाक़ तलाक़ बोल के घर से बाहर निकाल दिया गया था, रोटी कपड़े और छत के के लिये उसने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, समाज के कुछ जिम्मेदार लोगों की वजह से ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और सुप्रीम कोर्ट ने फैंसला दिया कि शाहबानो का पति हर महीने तीन सौ रूपये उस बेसहारा बुजुर्ग औरत को गुजारे भत्ते के तौर पर दे, बस फ़िर क्या था मुसलसल ईमान वालों का मज़हब कोर्ट के इस फैंसले से खतरे में पड़ गया, अमनपसंद कौम के लोगों ने सड़कों में उतर कर सुप्रीमकोर्ट के खिलाफ़ ही जुलूस निकालने शुरू कर दिये, उनके हिसाब से बूढ़ी शाहबानो या तो रोटी कपड़ा और छत के लिए दूसरे आदमी की बीवी बनती, या वक्फ़ बोर्ड के आगे अनाथों की तरह हाँथ फैलाती या भीख मांग कर गुज़ारा करती। मुसलमानों के विरोध प्रदर्शन हद से ज्यादा बढ़ गये तो वोटबैंक खोने के डर से केंद्र पर काबिज कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों की बात मान ली, और संसद में विधेयक पास करा कर सुप्रीम कोर्ट के इस फैंसले को पलट दिया..
अब देश का बहुसंख्यक हिन्दू, जो अपने धर्म ग्रंथों को दरकिनार कर के सुधारवादी सोंच को अपना रहा था, यह सब देख कर भौचक्का रह गया, उनके लिये ये समझ पाना मुश्किल था कि आखिर एक बूढ़ी बेसहारा औरत को 300 रु. गुज़ाराभत्ता दे देने से इस्लाम कैसे खतरे में पड़ जायेगा????
एक तरफ़ हिन्दू मैरिज एक्ट, मेंटीनेंस, विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह सतीप्रथा और छुआ छूत उन्मूलन समेत दत्तक ग्रहण उत्तराधिकार के नये नये कानून बनाए और लागू किये जा रहे थे.... दूसरी तरफ़ इस्लाम और शरीया _ सुप्रीम कोर्ट, न्याय साम्या और नैतिकता से भी ऊपर हो गया था मुसलमानों के लिये और दोगली धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस सरकार के लिये, देश का बहुसंख्यक वर्ग खुद को ठगा सा महसूस कर रहा था।
कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का इल्ज़ाम लगने लगा, अब हिन्दू वोट बैंक को अपने से दूर जाता देख कर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हिन्दुओं को खुश करने के लिये विवादित बाबरी मस्ज़िद या राम मंदिर के दरवाज़े खुलवा दिये..
हाँ राजनैतिक महत्वकांक्षाओं और कई कारणों से विभाजन और छिट पुट दंगे देश ने पहले भी भुगते थे.. लेकिन इस घटना के बाद यकीनी तौर पर भारतीय समाज में हिन्दू मुस्लिम के बीच स्पष्ट खाई खींचने का श्रेय कांग्रेस और कट्टर मुसलमानों को ही जाता है..
भाजपा तब देश की राजनीति में अपना वजूद तलाश रही थी, आडवाणी जैसे नेताओं और हिन्दू संगठनों ने इस सुनहरे मौके को लपक लिया, और आक्रोशित असंतुष्ट हिन्दुओं के मन में खुद को हिंदुत्व के रक्षक के रूप में रोप कर साम्प्रदायिकता की नई राजनैतिक परम्परा शुरू की.. जिसका नतीजा हम बाबरी विध्वंश, गुजरात, मुज़फ्फर नगर समेत अनेक दंगों के रूप में भुगतते आ रहे हैं। इखलाक/ हेमंत करकरे/ या तंज़ील अहमद ने संभवतः इसी साम्प्रदायिक राजनीति के षड्यंत्रों में अपनी जान गंवाई..
आज भी भाजपा और इन चरमपंथी संगठनो को ऑक्सीजन मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बनाये रखने की ज़िद, और फ़तवेबाज मुल्लों से ही मिलती है.. वो दिखाते हैं कि जहाँ जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं वहां इस्लाम ही शासन का आधार है तो हिन्दू बहुसंख्यक होने के बावजूद भी भारत हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं बन सकता?? वो चिंगारी भड़काते हैं और कुछ लोग भारत माता की जय न बोलने का फ़तवा दे कर, बीफ़ पार्टी का आयोजन कर के उस चिंगारी में पेट्रोल डाल देते हैं.. देश सुलग रहा है, इस आग में निर्दोष मासूम मारे जा रहे हैं.. और धर्मांध आज भी धर्म मज़हब की ही फ़िक्र लिये बैठे हैं।

Sunday, March 6, 2016

रोहित वेमुला : एक हार हुआ नौजवान जिसने आत्महत्या कर ली थी, और शर्मनाक बात ये है कि हमारे देश का मीडिया उसे हीरो बना रहा है,

कन्हैय्या कुमार का बाप पैरालाइज़्ड है और कई सालों से बिस्तर पर है, माँ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता है जहाँ उसे 3000 रूपये महीने की तनख्वाह मिलती है, एक भाई और है जो आईएएस की तैयारी कर रहा है। कन्हैया कुमार की उम्र लगभग 30 वर्ष है और वो जेएनयू में पीएचडी कर रहा है। कन्हैया कुमार बिहार के जिस इलाके का रहने वाला है वो बहुत पिछड़ा इलाका है और वहां हमेशा सीपीआई और सीपीआई माले का बोलबाला रहा है। अब सवाल ये उठता है कि जिस बेटे की माँ दिन रात मेहनत करके 3000 रूपये महीने कमाती हो उसका लड़का 30 साल की उम्र तक पढाई करेगा? दूसरा सवाल, जिसके क्षेत्र का विकास कम्युनिस्टों के रहते (या उनके कारण) नहीं हो पाया क्या वो उन्ही का फेवर करेगा? तीसरा सवाल, क्या एक गरीब दलित इतने महंगे वकील हायर कर सकेगा? और मजे की बात सुनिए, जिस लड़के को घर में इतनी परेशानियां हैं उसका आदर्श है, एक हार हुआ नौजवान जिसने आत्महत्या कर ली थी, और शर्मनाक बात ये है कि हमारे देश का मीडिया उसे हीरो बना रहा है, रविश कुमार जैसे सीरियस पत्रकार उसकी शान में कसीदे पढ़ रहे हैं।

Tuesday, March 1, 2016

ये जो मोदी विरोध का नशा है ना...बड़ा जहरीला होता है...!

हुजूर-ए-आला ये जो मोदी विरोध का नशा है ना...बड़ा जहरीला होता है जी...प्यार, मोहब्बत,भाईचारे,अमन की बाते करने वाले तथाकथित ह्यूमनवादी कब इस जहर की चपेट में आकर इस समाज के लिये जहरीले नाग बने जा रहे हैं इन्हें खुद नहीं समझ आ रहा।
देशद्रोही और देशभक्ति के सर्टिफिकेट पर रं रो करने वालों की दोगलईती देखो साहेब....सिर्फ भाजपा को सपोर्ट करने भर से ही ये खुद एक सेकंड में लोगों को संघी का सर्टिफिकेट बांटने से नहीं चूकते।
इस फॉर्मूले से तो 2014 लोस चुनावों में भाजपा को वोट देकर भारी बहुमत से उसकी सरकार बनाने वाली देश की आधी जनता इनके लिये संघी हो गई...और संघियों से इनकी नफरत जगजाहिर है.. फिर देश की आधी जनता मतलब संघियों से नफरत करने वाले खुद किस मुंह से भाईचारे की बात करतें हैं?
श्री श्री रविशंकर जी वर्तमान में भारत के सिंगल ऐसे आध्यात्मिक गुरु हैं जिनकी मैं दिल से इज्जत करता हूँ...ये हमेशा प्यार मुहब्बत भाईचारे की बात करतें हैं...इन्होंने आज तक कभी नफरत फैलाने वाला कोई विवादित बयान नहीं दिया....ना ही ये कभी किसी भी बात के लिये विवादों में ही आये...लेकिन सिर्फ मोदीजी को सपोर्ट करना इतना बड़ा गुनाह हो गया की एक टुच्ची सी वजह से खुद को मानवतावादी कहने वाले दोगले इनके चरित्रहनन पूरे जी जान से जुट गये।
हम पर असहिष्णु,अंधभक्त का आरोप लगाने से पहले इन्हें खुद के गिरेबान में झाँककर देखना चाहिये की सिर्फ विपरीत विचारधारा होने की वजह से दिन भर भक्त,अंधभक्त, संघी का सर्टिफिकेट बाँटा करते हैं......खुद विपरीत विचारधारा को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं और हमको असहिष्णु बोलते हैं...गजब की कुत्तई है यार।
अभी तक जिस कन्हैया को खुद का बाप बनाये घूम रहे थे उसी बाप ने सेना को बलात्कारी बोल दिया...अब बाप की बात से लौंडा तो सहमत होगा ही...है की नही?
मतलब अब तुम उसी सेना को बलात्कारी कहो जिसकी वजह से सुरक्षित घर में बैठे बुद्धिजीवीयापा छांट रहे हो फिर इसी बात पर हम तुमको देशद्रोही कह दे तो हम असहिष्णु, अंधभक्त संघी हो गये?
अभी वो एक जो फरार हो गया विजय माल्या...कॉंग्रेस के राज में 9000 करोड़ का लोन लिया...कोई पुछत्तर नहीं था...अभी भाजपा की सरकार बनते ही पूछताछ हुई...खुद को फंसता देख देश छोड़कर फरार हो गया....अब इसके लिये भी इल्जाम मोदी पर?
माने कॉंग्रेस होती तो 9000 करोड़ का लोन और दे देती....किसी को कानोकान खबर ना लगती...मिडीया में कोई बवाल ना होता....सब कुछ वैसे ही चलता रहता तब तो बढ़िया था लेकिन मोदी ने उसकी पूँछ पर लात रख दी तो मोदी बुरे हो गये? मतलब अब सच्चाई सामने लाना भी गुनाह हो गया?
अभी वो भागा नहीं की बगैर किसी सुबूत के सरकार पर उसको भगाने का इल्जाम लगा दिया...अबे कुछ दिन इन्तजार तो कर लेते...अगर कोई कार्यवाही ना होती तो हम भी तुमसे सहमत होते...पर तुम तो मोदी विरोध में इतने अंधे हो चुके हो की बिना सोचे समझे तुरन्त आरोप फेंकने को तैयार रहते हो...अबे कुछ तो सबर चाटो...
दिल में भरे मोदी से नफरत का जहर निकाल नहीं पा रहे और हमे भाईचारे का ज्ञान बाँटते हैं।
खुद नफरत का बीज बोकर हम पर जहर की खेती का आरोप लगाते हैं...भाई ताली एक हाँथ से नहीं बजती.....दूसरों से जैसे व्यवहार की अपेक्षा करते हो पहले खुद वैसा व्यवहार करना सीखो...
सबको पता है सांप को चाहे कितना भी दूध पिलाओ लेकिन साला वो काटेगा जरूर.....जाओ पहले खुद के जहर भरे दांत तोड़कर आओ फिर अगले से दूध पिलाने की उम्मीद करना।

कहीं रवीश कुमार बौद्धिक आतंकवाद तो नहीं फैला रहे हैं …

एक महिला पत्रकार के मन में उठा सवाल, कहीं रवीश कुमार बौद्धिक आतंकवाद तो नहीं फैला रहे हैं …
Kanhaiya-Kumar
लेख -- ‘रवीश जी आपके इस कार्यक्रम में बहुत आवाजों को जगह मिली लेकिन कुछ आवाजे आपने छोड़ दी। मैं यहां केवल उन आवाजों का जिक्र करना चाहती हूं।’

सच में रवीश जी कमाल कर दिया आपने, रिपोर्टिंग और एंकरिंग का एक नया आयाम छूने के लिए आपने जो कोशिश की है इसे इलेक्ट्रॉनिक जर्नलिज्म में आने वाली पीढ़िया भी भुला नहीं पाएंगी। इस अंधेरे ने हमें आवाजे सुनवाई ऐसी आवाजे जो हमें उद्वेलित करती हैं, विवेक खोने को मजबूर करती हैं, वो सारी आवाजे जो यह साबित करती हैं कि देशद्रोह का विरोध करने वाले हम सब भारतवासी और चंद न्यूज चैनल्स गलत हैं और आप सही। कितनी आसानी से आपने अपनी बात हम पर सबके मन में बैठा दी और साफगोई और निष्पक्ष होने की वाह-वाही भी लूट ली।
रवीश जी आपके इस कार्यक्रम में बहुत आवाजों को जगह मिली लेकिन कुछ आवाजे आपने छोड़ दी। मैं यहां केवल उन आवाजों का जिक्र करना चाहती हूं।
आपके कार्यक्रम में उन कुछ लोगों की आवाजें तो थी जिन्होंने कन्हैया को बिना जांच पूरी हुए देशद्रोही साबित कर दिया, लेकिन वो आवाजें कहां थी जिन्होंने बिना जांच पूरी हुए कन्हैया को निर्दोष करार दे दिया और जिनमें एक आवाज आपकी भी है।
आपने उन आवाजों की बात तो की जो यह कहती हैं कि कन्हैया की रिहाई की मांग करने वाले केवल लेफ्ट छात्र नहीं, बल्कि अन्य भी हैं, लेकिन वो आवाजें क्यों नहीं सुनवाई जो कहती है कि कन्हैया की गिरफ्तारी की मांग करने वाले केवल एबीवीपी के ही नहीं बल्कि सामान्य लोग भी हैं।
आपने वकीलों की आवाजें सुनवाई जो वंदे मातरम के नारे लगा रहे थे, और देशद्रोहियों को गालियां दे रहे थे लेकिन उमर खालिद समेत बहुत से जेएनयू छात्रों के उन नारों की आवाज कहा थीं जिनमें वो देश की बर्बादी, और भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे लगा रहे थे और जिसे आपने डॉक्टर्ड टेप कह दिया (बिना जांच के)।
आपके कार्यक्रम में उन आवाजों को जगह मिल गई जो कहते हैं कि यह देशद्रोह नहीं बल्कि बीजेपी और आरएसएस बिग्रेड द्वारा किया जा रहा भगवा सेफ्रोनाइजेशन का मामला है, लेकिन उन आवाजों का क्या हुआ जो कहते हैं कि कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा के लोग अपने फायदे के लिए देशद्रोह जैसे मामले पर दोषी छात्रों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
आपके कार्यक्रम में जेएनयू टीचर्स की आवाजों को जगह मिली लेकिन कर्नल जीडी बख्शी के आंसू क्यों नहीं सुनाई दिए।
आपने उन चंद बीजेपी ट्वीट्स को जगह दी जो राजदीप सरदेसाई और बरखा को गाली देते हैं और कुछ उन ट्वीट्स को भी, जो उनकी रिपोर्टिंग को सही ठहराते हैं, लेकिन वो हजारों ट्वीट्स कहा हैं, जो सामान्य लोगों के थे और जो एनडीटीवी की रिपोर्टिंग, बरखा, राजदीप सरदेसाई सबके द्वारा की गई रिपोर्टिंग को सिरे से नकारते हैं।
आवाजें तो और भी बहुत हैं लेकिन अगर उनको भी जगह मिल जाती तो शायद आप अपने मनसूबों में कामयाब नहीं हो पाते, जो हर हाल में बीजेपी का विरोध करना चाहते हैं चाहे वो देशद्रोह की कीमत पर ही क्यों ना हो। और फिर हमारी सरकार भी सही समय पर सही कार्रवाई करना नहीं जानती तो सजा तो उसे मिलनी ही चाहिए। एक व्यक्ति की भूल हमेशा ही दूसरे के लिए फायदे का सबब बनती है, जैसा कि इस मामले में हुआ, सरकार की ढिलाई, आप जैसे पत्रकारों को अपनी बातें मनवाने का अवसर दे रही है तो उठाईए अवसर का लाभ।
मेरी चिंता तो बस इतनी है कि इस पूरे मामले ने एक नए तरह के आतंकवाद को जन्म दिया है जिसे कहते हैं बौद्धिक आतंकवाद (इंटलेक्चुल टेररिज्म)… जो सीधे लोगों की सोच पर प्रहार करता है, ना गोली, ना खून, ना दंगा, ना खर्चा… और रिजल्ट- सौ फीसदी। देश के अंदर ही पनपने वाले इस आतंकवाद के चलते देश को दूसरे आतंकवादियों की तो जरूरत ही नहीं रही है। बहुद जल्दी आप और आप जैसे लोग अन्य देश विरोधी ताकतों का मोहरा बनेंगे, इस आतंकवाद को फैलाने और भारत और भारतीयता की जड़ को हिलाने के लिए…।
(फेसबुक: पत्रकार चित्रा गुप्ता की फेसबुक वॉल से )

Monday, February 29, 2016

क्या मंत्री होना उनकी संवेदनशीलता पर प्रतिबंध लगाने का काम कर देगा?

रामशंकर कठोरिया जैसे दलित नेता को आज मीडिया ने जमकर परेशान किया है।
उन्होंने अपने भाषण में किसी समुदाय का नाम नहीं लिया;मगर उन्होंने एक गोभक्त दलित की हत्या पर क्षुब्ध होकर जनता से कुछ बोला भी तो क्या बुरा बोला।
क्या मंत्री होना उनकी संवेदनशीलता पर प्रतिबंध लगाने का काम कर देगा?
न जाने कितने भड़काऊ भाषणों को हमने कुछ जाहिल मुसलमानों के तथाकथित रहनुमाओं के मुँह से सुना है कि दस मिनट के लिए पुलिस हटा लो तो हिन्दुओं को साफ़ कर देंगे। सड़ा;बदबूदार लाशों का चिथड़ा तुम लोग खाते हो;कुत्तों की तरह का भोजन करने वालों को साफ़ होने की आवश्यकता तुम्हें है।पहले ख़ुद की क़ौम को साफ़ करो।और रही पुलिस की बात तो कानून व्यवस्था बनाना उनका ही काम नहीं है।नागरिकों का भी काम है।
ख़ैर हिन्दू मुसलमान में वैमनस्य फैलाकर जो भी दंगों को देश की मासूम जनता पर थोपना चाहते हैं वो सभी नालायक लोग हैं।लेकिन एक गोभक्त की हत्या के ख़िलाफ़ अगर एक मंत्री भावनाओं में बह भी गया तो उसके पीछे पड़ने में मीडिया ने देर नहीं लगाई।
क्या इतनी तत्परता गोभक्त अरूण जो कि दलित है, के राजनीतिक संरक्षण पाए हत्यारों के पीछे पड़ने के लिए दिखाई थी?
हमें ख़बर भी नहीं थी कि राहुल गाँधी आत्महत्या करनेवाले याकूब मेनन के समर्थक देशद्रोही में दलित की संवेदना जग सकती है;मगर गोभक्त की हत्या पर उसका दलित होना ख़ारिज हो गया?
जनता! देख लो;दलितों की राजनीति करने वाले भी मानते हैं कि जो हिन्दू सनातन धर्म को प्रेम करता है वो दलित नहीं रहता;जो देशद्रोही मुसलमानों के चक्रव्यूह में फँसा हुआ है।वो ही असली दलित रह गया है।
ये दलित क़ौम का अपमान है।ये उनकी पददलित सोच का सर्टिफ़िकेट बाँट रहे हैं।
मनुवाद को गाली देकर ये तुम्हारे मन को ख़ुश कर सकते हैं लेकिन तुम्हें बौद्धिक संपदा के स्तर पर पहुँचा देखकर तुम्हें दलित होने के स्वीकार से ही मना कर देते हैं।कहते हैं कि दलित गौरवशाली संस्कृति का हिस्सा हो ही नहीं सकता।ये है उनकी घटिया राजनीति।
थूक भी नहीं सकता उन कमज़र्फ़ों पर;
मेरा थूक भी मैला हो जाएगा।
नहीं लेना है स्वाद इस राजनीति का;
सबका मुँह कसैला हो जाएगा।

Saturday, February 20, 2016

मैं रवीश कुमार हूँ...

प्रबुद्ध हूँ पर बेकार हूँ
खुद में पला अहंकार हूँ
निर्जीव पत्रकार हूँ
मैं रवीश कुमार हूँ...
दर्पण दिखाने में चला
सच्चाइयो की ओट कर
पर झूठ का अम्बार हूँ
मैं रवीश कुमार हूँ..
जल रहा क्रोधाग्नि में
माना कि लाखों खामियां
क्यों मान लूँ बीमार हूँ..
मैं रवीश कुमार हूँ..
पेशा मेरा निष्पक्ष था
पर पक्ष मेरा भी तो है
तुम इस पार मैं उस पार हूँ
मैं रवीश कुमार हूँ...
जानता हूँ हो रहा
मेरा पतन इस दौर में
रह गया बस खीज का भण्डार हूँ
मैं रवीश कुमार हूँ...

Wednesday, February 17, 2016

जेएनयू के गद्दार रामा नागा के पिता चूड़ी बेचते हैं और उसकी मां मजदूरी करती है तो क्या इसीलिए उसे गद्दारी की छुट है?

कन्हैय्या कुमार का बाप पैरालाइज़्ड है और कई सालों से बिस्तर पर है, माँ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता है जहाँ उसे 3000 रूपये महीने की तनख्वाह मिलती है, एक भाई और है जो आईएएस की तैयारी कर रहा है। कन्हैया कुमार की उम्र लगभग 30 वर्ष है और वो जेएनयू में पीएचडी कर रहा है। कन्हैया कुमार बिहार के जिस इलाके का रहने वाला है वो बहुत पिछड़ा इलाका है और वहां हमेशा सीपीआई और सीपीआई माले का बोलबाला रहा है। अब सवाल ये उठता है कि जिस बेटे की माँ दिन रात मेहनत करके 3000 रूपये महीने कमाती हो उसका लड़का 30 साल की उम्र तक पढाई करेगा? दूसरा सवाल, जिसके क्षेत्र का विकास कम्युनिस्टों के रहते (या उनके कारण) नहीं हो पाया क्या वो उन्ही का फेवर करेगा? तीसरा सवाल, क्या एक गरीब दलित इतने महंगे वकील हायर कर सकेगा? और मजे की बात सुनिए, जिस लड़के को घर में इतनी परेशानियां हैं उसका आदर्श है, एक हार हुआ नौजवान जिसने आत्महत्या कर ली थी, और शर्मनाक बात ये है कि हमारे देश का मीडिया उसे हीरो बना रहा है, रविश कुमार जैसे सीरियस पत्रकार उसकी शान में कसीदे पढ़ रहे हैं।
रविश कुमार के अनुसार जेएनयू के गद्दार रामा नागा के पिता चूड़ी बेचते हैं और उसकी मां मजदूरी करती है
तो क्या इसीलिए उसे गद्दारी की छुट है?

Sunday, February 14, 2016

JNU - जेएनयु का पूरा सच

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की छवि न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक स्वतंत्र उच्च शिक्षण संस्थान की है बल्कि यहां हर तरह की अभिव्यक्ति और बहस के लिए जगह मिलती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है लेकिन संसद पर हुए आतंकी हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी मनाकर उसे शहीद बताना और भारत विरोधी नारे लगे जैसी हरकतों को देश हित में नहीं कहा जा सकता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना उच्च शिक्षा में शोध कार्यों को बढ़ावा देने के लिए की गई थी, लेकिन वर्तमान समय में चल रहे विवादों के बीच ऐसा लगता है कि यह भारत विरोधियों का किला बन गया है।
इससे पहले भी जेएनयू छात्र कई बार देश विरोधी गतिविरोधी गतिविधियों में पैरवी करते नजर आए। चाहे फिदायीन इशरत जहाँ का मामला हो या संसद हमले के जिम्मेदार अफजल गुरु का मामला हो या मुंबई हमलों के लिए जिम्मेदार याकूब मेमन की फाँसी का सवाल हो। विपक्षी कई बार आरोप लगाते रहे हैं कि जब कभी चीन की फौज विवादित क्षेत्र से भारत में घुस आती है या पाकिस्तान की सेना सीमा पार से हमारे जवानों पर हमला करती है तो इनकी आवाज देश हित में क्यों नहीं उठता।

जेएनयू में कथित हिंदू विरोधी ही नहीं हिंदुस्तान विरोधी करतूतों की एक लम्बी फेहरिस्त है। कभी तिरंगे का, तो कभी देवी-देवताओं का अपमान।

इन आयोजनों को देखने के बाद यह साफ समझा जा सकता है कि इसका उद्देश्य या तो भारतीय संस्कृति और भारतीय संविधान को नीचा दिखाना है या फिर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना है।
 
परिसर में इन आयोजनों को देखते हुए जेएनयू पर देशविरोधी गतिविधियों को लेकर उठने वाली चिंता वाजिब ही है। वर्ष 2000 में करगिल में युद्घ लड़ने वाले वीर सैनिकों को अपमानित कर यहां चल रहे मुशायरे में भारत-निंदा का समर्थन किया। 26 जनवरी, 2015 को इंटरनेशनल फूड फेस्टिवल के बहाने कश्मीर को अलग देश दिखाकर उसका स्टाल लगाया गया। जब नवरात्रि के दौरान पूरा देश देवी दुर्गा की आराधना कर रहा था, उसी वक्त जेएनयू में दुर्गा का अपमान करने वाले पर्चे, पोस्टर जारी कर न सिर्फ अशांति फैलाई गई बल्कि महिषासुर को महिमामंडित कर महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन किया गया।

इससे पहले 24 अक्टूरबर, 2011 को भी कावेरी छात्रावास में लार्ड मैकाले और महिषासुर: एक पुनर्पाठ विषय पर सेमिनार में दुर्गा के सम्बन्ध में अपमानजनक टिप्पणियों से मारपीट की भी नौबत आ गई थी।

यही नहीं जेएनयू छात्रों ने गौमांस फेस्टिवल मनाने की जिद पर अड़े संगठनों को दिल्ली उच्च न्यायालय रोक लगाई। सबसे हैरत की बात है कि जब 10 अप्रैल, 2010 को जब पूरा देश छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलिओं के गोलियों से शहीद हुए 76 जवानों के गम में गमगीन था, उसी समय जेएनयू में जश्न मनाया जा रहा थे। यही नहीं उसका विरोध करने पर माओवादियों-नक्सलवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले छात्रों ने उन पर हमला किया गया जिसमें में कई छात्र बुरी तरह घायल हो गए थे। छत्तीसगढ़, झारखण्ड सहित कुछ राज्यों के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए ऑपरेशन ग्रीन हंट नामक अभियान का विरोध जेएनयू छात्रों ने पर्चे और पब्लिक मीटिंग के जरिए की।

जब नवंबर 2005 में मनमोहन सिंह के भाषण में छात्रों ने नारेबाजी की और पर्चे फेंके तो भी इनके सहिष्णुता  पर सवाल उठाए गए थे। हंगामा इस कदर मचा था कि बीच बचाव के लिए पुलिस को आगे आना पड़ा। अगस्त 2008 में जब विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज विभाग में अमेरिका के अतिरिक्त सचिव रिचर्ड बाउचर को भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के संबंध में बोलना शुरू किया तो लाल झण्डा उठाकर छात्रों ने अमेरिका हाय-हाय, परमाणु समझौता रद्द करो जैसे नारे लगाते हुए एस कदर हंगामा मचाया कि अंत में कार्यक्रम को ही स्थगित करना पड़ा और रिचर्ड बाउचर भी अपनी बात नहीं रख पाए थे।
जब 5 मार्च, 2011 को आयोजित एक सेमिनार जिसमें अरुंधती राय ने भाग लिया था, उसमें न सिर्फ भारत सरकार और संविधान के विरोध में नारे लगाए गए थे बल्कि बांटे गए पर्चे में जूते के तले राष्ट्रीय चिन्ह को दिखाया गया। यही नहीं 30 मार्च, 2011 और 2015 में को भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट विश्वकप के मैच में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए और भारत का समर्थन कर रहे छात्रों पर हमले किये गए। 24 अगस्त, 2011 को अन्ना आंदोलन के समय तिरंगे को फाड़कर पैरों से रौंदा भी गया।
विविधता में एकता भारत की सदियों पुरानी पहचान रही है। भारत में विभिन्न प्रकार के मत-मतान्तरों के बीच जिस प्रकार का सौहार्दपूर्ण सामाजिक तानाबाना देखने को मिलता है, वह शायद पूरी दुनिया में ढूंढने से भी दिखाई नहीं पड़ता। 2014 से पहले तक जेएनयू के कैंपस में इजरायल के किसी व्यक्ति यहां तक कि राजदूत तक का घुसना भी प्रतिबंधित हुआ करता था।

जहां तक वामपंथी विचारधारा की बात है तो न सिर्फ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी बल्कि उत्तर कोरिया, वियतनाम, क्यूबा, चिली, वेनेजुएला या पूर्व सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टियों के किसी सदस्यों ने कभी देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त नहीं पाए गए।
कहा जाता है कि जेएनयू की स्थापना के समय की तत्कालीन इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने अपने अनुकूल बौद्धिक माहौल तैयार करने, अपने वैचारिकता के अनुकूल इतिहास बनाने के लिए जेएनयू की स्थापना की थी। सत्ता पोषित सुविधा सत्तर के दशक की शुरुआत में जब इंदिरा गांधी को विरासत बचाने के लिए वामपंथियों की मदद लेनी पड़ी, वही वो वक्त था जब कम्युनिस्टों ने भी शिक्षण संस्थाओं पर कब्जा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि इंदिरा गांधी के काल में लेफ्ट विचारधारा के लोगों को संस्थान में महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया। लेकिन धीरे धीरे जेएनयू छात्र संगठन की ताकत लगातार बढ़ती गई और इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बार यहां के छात्रों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को परिसर के अंदर भी नहीं आने दिया था और लालकृष्ण आडवाणी को विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर ही रोक दिया था।
तब से लेकर आज तक जेएनयू में वैचारिक प्रतिनिधित्व के नाम पर एक ही विचारधारा का कब्जा रहा है? चाहे कश्मीर का मामला हो या उत्तर-पूर्व में नक्सल-माओवादी क्षेत्रों में सक्रिय हिंसा फैलाने वाले देशद्रोही और अलगाववादी ताकतों को समर्थन देने की, जेएनयू के छात्र संगठन हमेशा ही आगे नजर आते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर जी एन सार्इं बाबा हों या एसएआर गिलानी, खुफिया एजेंसियों ने कई बार इन्हे देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाया।

लेकिन यहां कई साकारात्मक बहसें भी देखा जा सकता है। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही कहा जा सकता है कि यहां समाज में छुपा लिए जाने वाले मुद्दों पर सीमा से आगे बढ़कर बहस की जाती रही है। चाहे वो समलैंगिकता की स्वतंत्रता पर बहस हो या महिलाओं को स्वछंद रहने और काम करने की आजादी का मद्दा यहां हर मुद्दे पर गंभीर बहस का आयोजन देखा जा सकता है।
जब दिल्ली भर में कांग्रेस सरकार की नाक के नीचे सिखों का कत्ल हो रहा था तब जेएनयू ने ही सिखों को शरण दी और देशभर में गुंडागर्दी का पर्याय बन चुकी छात्र राजनीति का शानदार नमूना भी पेश किया। इसी वैचारिक खुलेपन का आड़ लेकर कई बार अतिवादियों ने यहां से अपना एजेंडा भी चलाया। एंटी इस्टैब्लिशमेंट काम करना जेएनयू की परिपाटी रही है। परमाणु ऊर्जा, किसान आत्महत्या, भूमि अधिग्रहण, देश का औद्योगिकरण आदि मुद्दों पर इनका विरोध खुद तक सीमित रहा।

Monday, February 1, 2016

जो लोग सोशल मीडिया पर हम जैसों को ‪#‎भक्त‬ कह के बुलाते हैं, उनसे मैं कहना चाहता हूँ कि यदि ऐसा कह के आपकी मंशा हमें अपमानित करने की है तो आप फेल हो गए हैं। स्वयं के लिए 'भक्त' शब्द का संबोधन सुनकर हम अपमानित नहीं बल्कि गौरवान्वित महसूस करते हैं। हमें अपनी भक्ति पर अभिमान होता है। इनलोगों को यह समझ नहीं आता कि भक्ति एक भारतीय परंपरा है। और इस परंपरा में भक्त अपना भगवान स्वयं चुनता है। भक्त की भक्ति उसके भगवान की गुलाम नहीं है। वह तो उसके प्यार, विश्वास और श्रद्धा पर टिकी हुई है। जिस दिन उसका विश्वास डिग गया, वह अपने भगवान की भक्ति का परित्याग कर देगा, उसे सवालों के घेरे में खड़ा कर देगा। मतलब यह कि भक्त का भक्त होना या न होना किसी और के ऊपर नहीं बल्कि स्वयं उसके ऊपर निर्भर होता है। इसलिए 'भक्त' शब्द उसके लिए गाली न होकर उपाधि होती है जिसे वह गर्व से गले में लटकाए घूमता रहता है। वहीँ दूसरी ओर हम, सोनिया समर्थको "गुलाम "कह के बुलाते हैं। ऐसा करते समय हमारा मकसद उन्हें लज्जित करना होता है और हम ऐसा करने में सफल भी होते हैं। क्या आपने किसी कांग्रेसी या आपी को देखा है जो अपने आपको 'गुलाम कहने में गर्व का अनुभव करता हो? हाँ जिस दिन भक्त को लगा कि उसका भगवान उसकी भक्ति के काबिल नहीं रहा, वह उससे भगवान का दर्ज़ा छीन लेगा। पर सवाल उठता है कि क्या कोई 'गुलाम' कभी अपनी गुलामी की जंजीरें तोड़ पायेगा? जवाब है 'नहीं' क्यूंकि एक गुलाम को पता ही नहीं होता कि वह गुलाम है। ...जिस दिन उसे पता चल गया कि वह गुलाम है,  उसी दिन वह आज़ाद हो जायेगा।