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Sunday, September 4, 2016

G20 Summit में PM मोदी ने कैसे पाकिस्तान के साथ चीन को भी भी धोया???

PM मोदी ने कहा- ब्रिक्स देश मिलकर आतंकवाद के समर्थकों पर लें एक्‍शन




हांगझोऊ: पीएम मोदी ने ब्रिक्स देशों से आतंक के समर्थकों और प्रायोजकों को अलग-थलग करने का आह्वान किया है। जी-20 शिखर सम्मेलन से पहले ब्रिक्स देशों के नेताओं के साथ बैठक हुई। इसमें मोदी ने कहा कि आतंकियों के पास बैंक या हथियार के कारखाने नहीं हैं।
मोदी ने कहा कि इससे पता चलता है कि कोई उन्हें धन और हथियार देता है। हमें आतंकियों को मदद देने वालों को चिन्हित करके उन पर कार्रवाई करनी चाहिए। 
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मोदी ने आतंकवाद को लेकर और क्‍या कहा
–ब्रिक्स को आतंक से लडऩे के लिए संयुक्त प्रयास तेज कर देने चाहिए।
-आतंक के समर्थकों और उन्हें बढ़ावा देने वालों को अलग-थलग करने के लिए संयुक्त कार्रवाई करनी चाहिए।
-आतंकवाद अस्थिरता का प्रमुख कारण और समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
-जी-20 सम्मेलन से इतर आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल के साथ मुलाकात में भी मोदी ने इस मुद्दे को उठाया।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने क्या कहा
पाकिस्तान का नाम लिए बिना पीएम मोदी ने टर्नबुल से कहा कि खास तौर से हमारा (भारत) पड़ोसी आतंकवाद के अस्थिर करने वाले प्रभाव से परेशान है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आतंकवाद के आपूर्तिकर्ताओं, निर्यातकों और वित्त पोषकों को चिह्नित किया जाना चाहिए।



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Tuesday, August 30, 2016

भारत और अमेरिका के बीच हुए रक्षा करार से उड़ी चीन की नींद

भारत और अमेरिका के बीच हुए रक्षा करार से उड़ी चीन की नींद




नयी दिल्ली/वाशिंगटन : भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग समझौते से चीन और पाकिस्तान की नींद उड़ चुकी है हालांकि चीन इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहा है. उसने इस करार को दोनों देशों के बीच सामान्य सहयोग बताया है जबकि इसको लेकर चीन का मीडिया भारत से बेहद खफा है. उसने चेताया है कि अमेरिकी खेमे में जाने की भारत की कोशिश से चीन, पाकिस्तान और रूस की नाराजगी बढ़ सकती है.

आपको बता दें कि भारत और अमेरिका ने द्विपक्षीय सामरिक संबंधों को बढ़ावा देते हुए एक विशद साजो-सामान आदान-प्रदान करार पर हस्ताक्षर किये हैं, जिससे दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे की सुविधाओं
एवं ठिकानों का उपकरणों की मरम्मत एवं आपूर्ति को सुचारु बनाये रखने के लिए उपयोग कर सकेंगे. इससे उनके संयुक्त अभियानों की दक्षता में इजाफा होगा. रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर एवं अमेरिकी रक्षा सचिव एश्टन कार्टर ने ‘साजो-सामान आदान-प्रदान सहमति करार’ (एलइएमओए) पर हस्ताक्षर किये.

पर्रीकर ने कहा कि इससे व्यावहारिक संबंध एवं आदान-प्रदान के लिए अवसर का सृजन होगा. एलइएमओए से भारत एवं अमेरिका के बीच साजो-सामान सहयोग, आपूर्ति एवं सेवाओं का उसकी पुन:पूर्ति के आधार पर प्रावधान होगा. इसमें खाना, पानी, वस्त्र, परिवहन, पेट्रोलियम, तेल, लुब्रिकेंट, परिधान, चिकित्सा सेवाएं, कलपुर्जे एवं उकरण, मरम्मत एवं देखभाल सेवाएं, प्रशिक्षण सेवाएं तथा अन्य साजो-सामान की वस्तुएं एवं सेवाएं शामिल हैं. पर्रीकर ने स्पष्ट किया कि (समझौते में) भारत में किसी तरह का सैन्य अड्डा या किसी तरह की गतिविधि स्थापित करने का कोई प्रावधान नहीं है. करार पर हस्ताक्षर होने के बाद एक संयुक्त बयान में कहा गया, ‘वे इस तंत्र पर सहमत हुए कि इस प्रारूप से रक्षा प्रौद्योगिकी एवं व्यापार सहयोग में अभिनव एवं आधुनिक अवसरों के अवसर मिलने में सुविधा होगी.

अमेरिका अपने स्तर पर भारत के साथ रक्षा व्यापार एवं प्रौद्योकिगी को बढ़ाने पर सहमत हुआ है तथा यह भारत को उस स्तर के बराबर ले जायेगा, जो उसके नजदीकी सहयोगी एवं भागीदारों को प्राप्त है. बयान के अनुसार, दोनों देशों के बीच के रक्षा संबंध उनके ‘साझा मूल्यों एवं हितों’ तथा ‘वैश्विक शांति एवं सुरक्षा के प्रति उनकी स्थायी प्रतिबद्धता’ पर आधारित हैं.

चीन और पाकिस्तान की नींद उड़ी

भारत और अमेरिका के बीच सैन्य साजो-सामान हस्ताक्षर के बाद चीन और पाकिस्तान की नींद उड़ गयी है. दोनों देशों में साफ तौर पर बेचैनी देखी जा रही हैं. दोनों देशों के मीडिया में कहा जा रहा है कि इस समझौते से चीन और पाकिस्तान पर सीधा असर होगा. पाकिस्तानी और चीनी मीडिया में कहा जा रहा है कि एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव के लिए अमेरिका और भारत इस एग्रीमेंट को अंजाम दिया है.

पिछलग्गू न बने भारत

इस समझौते को लेकर चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. अखबार ने अपने संपादकीय में लिखा है कि बेशक यह अमेरिका और भारत के सैन्य सहयोग में एक बड़ा कदम है. यदि भारत अमेरिकी गंठबंधन के तंत्र में जल्दबाजी में शामिल हो जाता है, तो इससे चीन, पाकिस्तान और यहां तक कि रूस भी नाराज हो सकता है. ग्लोबल टाइम्स ने चेतावनी दी है कि यह समझौता नयी दिल्ली को वाशिंगटन का ‘पिछलग्गू’ बना सकता है. 

 

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चीन के खिलाफ मोदी ने की 3 तरफ से घेराबंदी, चीन बुरी तरह बोखलाया

चीन के खिलाफ मोदी ने की 3 तरफ से घेराबंदी, चीन बुरी तरह बोखलाया


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वॉशिंगटन. भारत तीन तरीके से चीन को घेरने की कोशिश कर रहा है। इंडिपेंडेंस-डे की स्पीच में मोदी ने बलूचिस्तान का जिक्र कर चीन को बयान देने को मजबूर कर दिया था। इसी के बाद लंदन में चीनी एम्बेसी पर बलूच नेताओं ने प्रदर्शन किए। अब भारत ने चीन को रोकने के मकसद से यूएस के साथ बड़ा डिफेंस एग्रीमेंट किया है। मनोहर पर्रिकर की मौजूदगी में सोमवार को हुई इस डील के तहत दोनों देश एक-दूसरे के नेवल और एयर बेस का इस्तेमाल कर सकेंगे। वहीं, मोदी अगले महीने बीजिंग में जी-20 समिट से पहले चीन के विरोधी देश वियतनाम जाएंगे। इस बीच भारत-यूएस डील से तिलमिलाए चीन ने कहा, ‘भारत चतुराई भरा कदम उठा रहा है। लेकिन समझौते के चलते भारत को अपनी राजनीतिक आजादी गंवानी पड़ सकती है। डील से भारत के चीन, पाकिस्तान और रूस से रिलेशन खराब हो सकते हैं। साथ ही इससे भारत सेफ भी नहीं होगा।’
1# मोदी ने पर्रिकर को यूएस भेजा, बड़ी मिलिट्री डील कराई
 वॉशिंगटन में सोमवार को डिफेंस मिनिस्टर मनोहर पर्रिकर और उनके अमेरिकी काउंटरपार्ट एश्टन कार्टन ने लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) पर साइन किए।
 डील का मकसद चीन की ताकत को खासकर समंदर में बढ़ने से रोकना है ।
 समझौते के मुताबिक, दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के इक्विपमेंट्स और नेवल-एयरबेस का इस्तेमाल कर सकेंगी। दोनों देशों को फाइटर प्लेन और वॉरशिप के लिए फ्यूल भी आसानी से मिल सकेगा।

पर्रिकर ने कहा, “समझौते के तहत भारत-अमेरिकी नेवी एक-दूसरे को ज्वाइंट ऑपरेशन और एक्सरसाइज में सपोर्ट करेंगी।”
अमेरिका भारत के साथ लंबे समय से ऐसा समझौता चाहता रहा है, जिसमें सिक्युरिटी को-ऑपरेशन के अलावा जानकारियां भी साझा की जा सकें।
LEMOA के तहत दोनों देश एक-दूसरे से पानी और खाने जैसे रिसोर्सेस की भी शेयरिंग करेंगे। हालांकि, इस समझौते के मायने भारत की धरती पर अमेरिकी सैनिकों की तैनाती नहीं है।
– वहीं, भारत के किसी मित्र देश से अमेरिका अगर वॉर छेड़ता है तो उसे ये फैसिलिटी नहीं मिलेगी।
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2# चीन को घेरने के लिए मोदी जी-20 बैठक से पहले जाएंगे उसके विरोधी देश वियतनाम
 मोदी अगले महीने चीन में होने वाली जी-20 समिट से पहले वियतनाम जाएंगे। 3 सितंबर को मोदी राजधानी हनोई में होंगे। यह किसी भी भारतीय पीएम की पिछले 15 साल में पहली वियतनाम विजिट होगी।
4 से 5 सितंबर को चीन में जी-20 समिट होनी है।
– मोदी वियतनाम विजिट साउथ-ईस्ट एशिया में भारत की बढ़ती स्ट्रैटजिक मौजूदगी का भी संकेत होगी।
– अफसरों की मानें तो मोदी इस दौरान वियतनाम को फौजी ताकत बढ़ाने में मदद का प्रपोजल भी दे सकते हैं।
– बता दें कि चीन और वियतनाम के बीच 1970, 1980 और 1990 के दशक में जंग हो चुकी है। दोनों के बीच साउथ चाइना सी को लेकर विवाद है।
3# इंडिपेंडेंस-डे की स्पीच में बलूचिस्तान का जिक्र किया तो चिढ़ा चीन, कार्रवाई की धमकी
– चीन के एक थिंक टैंक ने भारत को वॉर्निंग दी है। उसने कहा कि यदि भारत बलूचिस्तान में 46 अरब डॉलर की लागत से बन रहे चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को बनने से रोकेगा तो चीन कार्रवाई से गुरेज नहीं करेगा।
– चीन के इंटरनेशनल रिलेशन इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर हू शीशेंग ने कहा कि मोदी का बलूचिस्तान का जिक्र चीन की ‘ताजा चिंता’ है। भारत के अमेरिका से बढ़ते सैन्य संबंध और साउथ चाइना सी पर उसका रवैया चीन के लिए खतरे की घंटी के समान है।
– वहीं, चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, “मोदी अपना सब्र खो चुके हैं और उन्होंने दुश्मनी के कट्टर लहजे को अपना लिया है।”
– ग्लोबल टाइम्स में ‘मोदी की उकसावे वाली कार्रवाई से भारत पर बढ़ता खतरा’ नामक रिपोर्ट में कहा गया, “जब भारत बलूचिस्तान में अपनी किसी भी तरह की भूमिका से इनकार करता रहा है तब मोदी क्यों पब्लिकली इसका जिक्र करते हैं? कश्मीर पर भी वे इतना उकसावे वाला कदम उठाते हैं?”
लॉजिस्टिक्स डील से घबराए चीन ने कहा- भारत पिछलग्गू न बने
– भारत-यूएस डील को लेकर चीनी सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, ‘भारत-अमेरिका मिलिट्री रिलेशन में ये एक लंबी छलांग है। फोर्ब्स ने इस समझौते को वॉर पैक्ट बताते हुए कहा है कि भारत अपने पुराने साथी रहे रूस के पाले से निकलकर अमेरिका की तरफ शिफ्ट हो रहा है।’
– ग्लोबल टाइम्स लिखता है, ‘भारत चतुराई भरा कदम उठा रहा है। लेकिन समझौते के चलते भारत को अपनी राजनीतिक आजादी गंवानी पड़ सकती है। डील से भारत के चीन, पाकिस्तान और रूस से रिलेशन खराब हो सकते हैं। साथ ही इससे भारत सेफ भी नहीं होगा।’
– ‘बीते कुछ सालों से अमेरिका जानबूझकर भारत से ज्यादा नजदीकी दिखा रहा है ताकि इस इलाके में चीन के ऊपर दबाव बनाया जा सके।’
– ‘ये भी पॉसिबल है कि मोदी एडमिनिस्ट्रेशन भारत को एक गैर-परंपरागत रास्ते पर जाने की कोशिश कर रहा है। इस दिशा में अमेरिका से लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट अहम कदम है। सवाल ये है कि भारत-अमेरिका रिलेशन का भू-राजनीतिक मूल्यों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?’
– ‘अगर भारत जल्दबाजी में अमेरिका का सहयोगी बन रहा है तो वह खुद ही रणनीतिक जाल में फंसेगा और एशिया में कॉम्पिटीशन को हवा देगा।’

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भारत-अमेरिका वॉर पैक्ट से पाक, चीन बुरी तरह डरे ,कहा- मोदी खुलकर दुश्मनी निभा रहे







भारत-अमेरिका वॉर पैक्ट से पाकिस्तान और चीन बुरी तरह डरे ,कहा- मोदी खुलकर दुश्मनी निभा रहे हैं

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नई दिल्ली.भारत-अमेरिका के बीच लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरैंडम ऑफ एग्रीमेंट से पाकिस्तान-चीन के मीडिया में हलचल मची है। दोनों देशों के मीडिया का कहना है कि एशिया में चीन के बढ़ते असर को देखते हुए अमेरिका और भारत ने इस समझौते को अंजाम दिया है। चीनी मीडिया ने यह तक कहा कि पाकिस्तान से रिश्ते बिगड़ने पर मोदी अब खुलकर दुश्मनी निभा रहे हैं। वहीं, अमेरिकी मीडिया का कहना है कि भारत-अमेरिका के बीच लगातार मिलिट्री पार्टनरशिप बढ़ रही है।
क्या है चीन और पाकिस्तान के बौखलाने की दो बड़ी वजह हैं…


# पहली:
– वॉशिंगटन में सोमवार को डिफेंस मिनिस्टर मनोहर पर्रिकर और उनके अमेरिकी काउंटरपार्ट एश्टन कार्टन ने लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) पर साइन किए।
– डील का मकसद चीन की ताकत को खासकर समंदर में बढ़ने से रोकना है। समझौते के मुताबिक, दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के इक्विपमेंट्स और नेवल-एयरबेस का इस्तेमाल कर सकेंगी।
– LEMOA के तहत दोनों देश एक-दूसरे से पानी और खाने जैसे रिसोर्सेस की भी शेयरिंग करेंगे। हालांकि, इस समझौते के मायने भारत की धरती पर अमेरिकी सैनिकों की तैनाती नहीं है।
# दूसरी:
– इंडिपेंडेंस-डे की स्पीच में मोदी ने बलूचिस्तान पर चीन और पाकिस्तान को एकसाथ घेरने की कोशिश की है। इसी के बाद लंदन में चीनी एम्बेसी पर बलूच नेता प्रदर्शन कर रहे हैं।
– वहीं, बलूचिस्तान, सिंध और पीओके में भी पाक के खिलाफ प्रदर्शन तेज हो गये हैं। वहां के नेता खुलकर सामने आ रहे हैं।
चीन के ग्लोबल टाइम्स ने लिखा- अमेरिका का पिछलग्गू बन रहा है भारत
– “यह बेशक अमेरिका-भारत के बीच सैन्य साझेदारी की लंबी छलांग होगी। लेकिन ऐसा समझौता करने से भारत अपनी रणनीतिक आजादी खो सकता है और अमेरिका का पिछलग्गू बनता जा रहा है।”
– ”मोदी पाकिस्तान के साथ रिश्ते को सुधारने की कोशिशों के बाद अपना सब्र खो चुके हैं और उन्होंने रुख बदलकर दुश्मनी वाला भाव अपना लिया है।”
– अमेरिकी मैग्जीन फोर्ब्स ने इस पैक्ट को ‘वॉर पैक्ट’ बताते हुए कहा है कि भारत अपने शीत युद्ध के साथी रूस के पाले से निकल कर अमेरिका की तरफ जा रहा है।


India\\\'s alliance with US may irritate China and pakistan, international news in hindi, world hindi news

पाक के न्यूजपेपर डॉन ने लिखा- चीन को रोकने के लिए यह वॉर पैक्ट, पाक-चीन पर सीधा असर पड़ेगा
– “अमेरिका और भारत लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरैंडम ऑफ अग्रीमेंट के तहत दोनों देश एक दूसरे के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कर सकेंगे। अमेरिकी सेना और उसकी वायुसेना के लिए भारत के सैन्य अड्डों से लड़ना आसान होगा।”
– ”भारत भी पूरी दुनिया में अमेरिकी बेस का इस्तेमाल कर सकता है। इसका सीधा असर पाकिस्तान और चीन पर पड़ेगा।”
– अखबार ने अमेरिकी पत्रिका फोर्ब्स में छपे एक आर्टिकल का हवाला भी दिया है, जिसमें कहा गया है कि पाकिस्तान और चीन सावधान हो जाएं, इस हफ्ते भारत और अमेरिका बहुत बड़ा सैन्य समझौता कर सकते हैं।

अमेरिका की फोर्ब्स मैगजीन ने लिखा- मोदी रूस को नजरअंदाज कर आगे बढ़ रहे हैं
– “चीन को काबू में रखने के लिए ओबामा प्रशासन के कार्यकाल का यह एक बेहद अहम एग्रीमेंट है। इससे भविष्य में भारत को चीन के सामने खड़े होने के लिए मजबूत आधार मिलेगा।”
– ”इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकी सेना का प्रभाव भी बढ़ेगा। इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका को सब कुछ बनाना पड़ा था लेकिन इंडिया के पास पहले से ही बुनियादी चीजें मौजूद हैं।”
– ”हालांकि इस समझौते से भारत और उसके भरोसेमंद सहयोगी रूस के रिश्तों में तनाव आ सकता है। मोदी को इसकी परवाह नहीं है।”

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बलूचिस्तान पर पीएम मोदी के दम पर लंदन अमेरिका रूस से भी मिला समर्थन, चीन तिलमिलाया

 बलूचिस्तान पर पीएम मोदी के दम पर लंदन अमेरिका रूस से भी मिला समर्थन, चीन तिलमिलाया





बलूचिस्तान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए बयान को विदेशों से भी समर्थन मिलने लगा है। अमेरिका, जर्मनी के बाद लंदन से भी PM के समर्थन की खबरें मिल रही हैं।
लंदन में ‘पीएम मोदी फॉर बलूचिस्तान’ और ‘कदम बढ़ाओ मोदी जी हम तुम्हारे साथ हैं’ जैसे नारों के साथ लोगों ने प्रदर्शन किया। लंदन में मौजूद सिंध और बलूचिस्तान के नेताओं ने चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर कि भी खिलाफत की।  
बीते शनिवार को जर्मनी में भी इसी तरह के दृश्य देखने को मिले थे। जब वहाँ लेपिजिग शहर में कई बलूच कार्यकर्ता सड़क पर उतारे और एक रैली का आयोजन किया। इन लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में नारे भी लगाए। इस रैली कि ख़ास बात यह थी की कार्यकर्ताओं के हाथ में तिरंगा था।

अमेरिका ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर तथा बलूचिस्तान प्रांत में मानवाधिकार की स्थिति पर चिंता जताई थी। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मार्क टोनर ने कहा था कि अमेरिका वहां ‘मानवाधिकार की स्थिति’ को लेकर चिंतित है और ‘इसका उल्लेख अपनी मानवाधिकार रिपोर्ट में भी किया है।’ टोनर ने यह भी कहा था कि अमेरिका ने पाकिस्तान से क्षेत्र में मौजूद समस्याओं का समाधान हमेशा शांतिपूर्ण ढंग से और राजनीतिक प्रक्रिया के जरिये ढूंढ़ने का आग्रह किया है।
स बीच चीन के एक प्रभावी थिंक टैंक ने कहा है कि अगर भारत के किसी ‘षड्यंत्र’ ने बलूचिस्तान में 46 अरब डालर लागत की चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजना को बाधित किया तो फिर चीन को ‘मामले में दखल देना पड़ेगा।’
चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ कंटम्पररी इंटरनेशनल रिलेशन्स के इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एंड साउथ-ईस्ट एशियन एंड ओसिनियन स्टडीज के निदेशक हू शीशेंग ने कहा है कि स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से दिए गए भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बलूचिस्तान का जिक्र, चीन और इसके विद्वानों की ‘ताजा चिंता’ है।
चीन की स्टेट सिक्योरिटी के मंत्रालय से संबद्ध इस प्रभावी थिंकटैंक के अध्ययनकर्ता ने यह भी कहा कि भारत का अमेरिका से बढ़ता सैन्य संबंध और दक्षिण चीन सागर पर इसके रुख में बदलाव चीन के लिए खतरे की घंटी के समान है।
उन्होंने कहा कि यह पाकिस्तान के प्रति भारत की नीति में निर्णायक मोड़ हो सकता है। चीनी बुद्धिजीवियों की चिंता की वजह यह है कि भारत ने पहली बार बलूचिस्तान जिक्र किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि मोदी द्वारा भाषण में इस इलाके के उल्लेख से पाकिस्तान को संकेत दिया गया है कि जम्मू एवं कश्मीर में आतंकियों को समर्थन देने पर उसे उसी की भाषा में जवाब मिलेगा। इससे भारत-चीन के संबंध और बिगड़ेंगे।
हू ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग भी चीन के लिए चिंता की वजह बन रहा है। पहले चीन को इससे फर्क नहीं पड़ता था कि भारत का किससे रक्षा सहयोग है, लेकिन अब चीन में इसे लेकर चिंता महसूस की जा रही है।

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Monday, July 18, 2016

PM मोदी के इन फैसलों से घबराया अमेरिका, आर्थिक रफ्तार पर फैला रहा झूठ, भारत ने ऐसे रचा नया इतिहास

PM मोदी के इन फैसलों से घबराया अमेरिका, देश की आर्थिक रफ्तार पर फैला रहा झूठ, भारत ने ऐसे रचा नया इतिहास



भारत के संदर्भ में दुनिया के कई देशों के बीच ऐसा पहली बार हो रहा है कि भारत तेजी से आर्थ‍िक ग्रोथ के साथ ढांचागत प्रगति भी कर रहा है। इस समय भारत आर्थिक विकास दर साढ़े सात फीसद की तेज गति से बढ़ रही है जो कि विश्व के स्तर पर किसी भी देश की तुलना में सबसे ज्यादा है। लेकिन इस तेज कदम से आगे बढ़ते भारत की प्रगति जैसे भारत के कुछ पड़ोसी देशों को नहीं सुहाती, वैसे ही कल तक रक्षा, व्यापार और तमाम क्षेत्रों में बराबरी से सहयोग देने का वायदा करने वाले अमेरिका को भी अब रास नहीं आ रही है।
Modi Cabinet
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तेज रफ्तार के पहले ही विश्व के कई देश मुरीद बन चुके हैं, यहां तक कि अमेरिका में भी भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति श्रद्धा, प्रेम और विश्वास रखने वालों की संख्या कहीं ज्यादा है। इन वर्तमान उभरी परिस्थ‍ितियों को देखकर लगता है कि अमेरिका भी उन सभी पूर्व की गई भविष्यवाणियों से डरने लगा है, जो भारत को 21 वीं सदी में दुनिया का शक्तिसम्पन्न समृद्ध राष्ट्र बन जाने की घोषणा करती हैं। नहीं तो भला क्या कारण हो सकता है‍ कि अमेरिका जैसा दुनिया का सबसे ताकतवर देश भारत की विकास दर को झूठा बताने के प्रयत्न करे। 
यह बात आज इसलिए चर्चा में आई है, क्योंकि अमेरिकी विदेश मंत्रालय को लगता है कि भारत वास्तव में प्रगति नहीं कर रहा है, उसकी यह ग्रोथ बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई है। रिपोर्ट कितनी वास्तविक है, वह इसमें कही गई बातों से समझा जा सकता है। रिपोर्ट में भारतीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों पर संदेह जताते हुए कहा गया है कि नरेंद्र मोदी सरकार आर्थिक सुधारों के अपने वादों को पूरा करने की दिशा में धीमी रही है।
अमेरिकी विदेश विभाग के आर्थिक एवं कारोबार ब्यूरो की ओर से तैयार यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में भारत की विकास दर सबसे तेज है। लेकिन निवेशकों के कमजोर पड़ते रुझानों से संकेत मिलता है कि करीब 7.5 फीसद की यह वृद्धि दर वास्तविकता से अधिक बताई गई है।
INDIA-ECONOMY-BUDGET-CONSTRUCTION
रिपोर्ट के मुताबिक, कई प्रस्तावित आर्थिक सुधारों को संसद में पारित कराने के लिए सरकार को कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है। इस कारण राजग सरकार के समर्थन में आगे आए कई निवेशक पीछे हट रहे हैं। मोदी सरकार संसद में भूमि अधिग्रहण बिल पर पर्याप्त राजनीतिक समर्थन नहीं जुटा पाई है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के मामले में भी यही हाल है। जीएसटी संविधान संशोधन बिल संसद से पारित नहीं हो सका है। सरकार की ओर से इस को लेकर विपक्षी दलों के साथ अब भी विचार-विमर्श चल रहा है। यानी कि भारत में आर्थ‍िक दृष्ट‍ि से जो कुछ इन दिनों हो रहा है वह पूरी तरह सही नहीं है। 
हालांकि यहां आगे इस बात का भी कहीं जिक्र है कि मोदी सरकार ने नौकरशाही और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के क्षेत्र में बाधाओं को कम करने की दिशा में कई सही कदम उठाए हैं, जिनके कारण विदेशी धन का प्रवाह भारत की ओर तेजी से हुआ है, लेकिन जो मूल बात इस रिपोर्ट की है, वह यही है कि भारत की विकास दर सही नहीं है, बल्‍कि वह वास्तविकता से दूर बढ़ा चढ़ाकर बताई जा रही है।
वस्तुत: यहां कहना होगा कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय ऐसी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दुनिया के सामने भारत के विषय में भ्रम फैलाने का कार्य कर रहा है, जिससे कि विश्वभर में तेजी से भारत के प्रति बन रहे उत्साहवर्धक और सकारात्मक माहौल को रोका जा सके।
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वास्तव में अमेरिका द्वारा फैलाए जा रहे इस झूठ को इससे भी समझा जा सकता है कि पिछले दो वर्षों में आईं तमाम रिपोर्ट, चाहे वे विश्व बैंक, एशि‍यन बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी, संयुक्त राष्ट्र या अन्य किसी की क्यों न हों, सभी ने एक स्वर में यह बात स्वीकारी है कि भारत आज विकसित, विकासशील और तीसरी दुनिया के देशों के बीच सबसे ज्यादा तेज गति से विकास कर रहा है।  
अमेरिकी विदेश मंत्रालय की यह रिपोर्ट क्या, हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के पिछले वर्ष ही किए गए उस अध्ययन को झुठला सकती है, जिसके निष्कर्ष बताते हैं कि भारत के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की वृद्धि दर दुनिया के प्रमुख देशों में सबसे ज्यादा रहेगी और भारतीय अर्थव्यवस्था अगले आठ साल तक सालाना औसतन 7.9 प्रतिशत की रफ्तार से दौड़ते हुए चीन को पीछे छोड़ देगी।
दरअसल, यदि हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (सीआइडी) की जमीनी स्तर पर तैयार की गई रिपोर्ट सही है, तो निश्चित तौर पर कहना होगा कि अमेरिका आज जो बात भारत की ग्रोथ को लेकर कह रहा है, वह भ्रम फैलाने के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है।  

इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र की गत् वर्ष की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत की मौजूदा आर्थिक वृद्धि दर की जो रफ्तार है, उस हिसाब से भारत चीन को पीछे छोड़ देगा। यहां यह भी बताया गया था कि 2016 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि 7.7 प्रतिशत रहेगी।
वस्तुत: भारत के विकास के कुछ संकेत इससे भी समझे जा सकते हैं कि जब से काले धन पर अंकुश लगाने के प्रयास भारत सरकार की ओर से शुरू किए गए, तब से लेकर अब तक लगातार स्वि‍स बैंक हो या अन्य किसी देश के बैंक उनमें भारतीयों की काली कमाई का प्रतिशत लगातार घट रहा है।
देश के व्यापारी या अन्य प्रतिष्ठि‍त जनता जनार्दन के बीच श्रेष्ठी जन, जो भी हैं, बहुत तेजी से इस बात को स्वीकार करने लगे हैं कि एक नंबर में रुपया रखना ही बेहतर है। विदेश में धन जमा करने से अच्छा है कि अपने ही देश में उसे व्यापार के नये आयामों में व्यय किया जाए, जिससे कि उसका अधि‍क से अधि‍क सद्उपयोग होने के साथ लोगों को भी रोजगार मिले। वस्तुत: वर्तमान ग्रोथ जो दिख रही है, वह इस सोच के कारण भी है, ऐसा भी कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा।
इसके अलावा भी तमाम अन्य कारणों में विशेष महत्व का मोदी सरकार के लिए गए पिछले दो सालों के निर्णय हैं, जो कि सभी क्षेत्रों में समान रूप से लिए गए, इस विकास के जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं।
INDIA-ECONOMY
देश में लगातार हो रहे ढ़ाचागत सुधार, स्टार्टअप और पूंजीगत सुधार भी बड़ा कारण हैं कि पिछले वित्त वर्ष 2015-16 की चौथी तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 7.9 फीसद रही। पूरे वित्त वर्ष 2015-16 में आर्थिक विकास दर 7.6 फीसद रही थी। जो कि ग्लोबल आधिकारिक अनुमान के मुताबिक ही है। इसके पूर्व वर्ष को भी देखें तो भारतीय विकास दर इस संदर्भ में की गई वैश्विक घोषणाओं के अनुसार ही रही थी, 2014-15 में देश की जीडीपी 7.2 फीसद थी। 


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