ससम्मान रिहा कर दिया… देशी-विदेशी दोनों सरकारों को उनके राष्ट्रवादी विचारों से डर लगता था…।
़श्री राय नें अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि जब वीर सावरकर की धर्मपत्नी बेहद गम्भीर बीमार थी तब उन्होंने पैरोल के लिए आवेदन दिया .. अंग्रेजी कानून के मुताबिक जब भी कोई सेनानी पेरोल के लिए आवेदन देता था तो उसे अपने अच्छे चाल-चलन की गारंटी देनी होती थी .. ये प्रथा आज भी है … लेकिन धूर्त इतिहासकार सिर्फ उनके पेरोल आवेदन को ही दिखाकर कहते है की सावरकर डर गये थे .. जबकि सच्चाई ये है की जब जेलर ने उन्हें कहा की मजिस्ट्रेट के सामने यूनियन जैक [अंग्रेजी झंडा] के सामने शपथ लेनी होगी .. तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया और कहा की भले ही मैं अपनी मरती पत्नी को न देख सकूं ..लेकिन मै अंग्रेजी झंडे की शपथ नही ले सकता | और उन्होंने अपनी पेरोल का आवेदन वापस ले लिया | इतना ही नहीं वीर सावरकर ऐसे पहले बैरिस्टर थे जिन्होंने 1909 में ब्रिटेन में ग्रेज-इन परीक्षा पास करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफादार होने की शपथ नही ली… इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नही दिया गया…।
गोडसे फिल्म निर्माता डॉ0 संतोष राय नें कांग्रेस की कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हुए कहा कि जेल में सावरकर ने दिवालों पर नाख़ून और कोयले से कई किताबे लिखी ..जो देश आजाद होने के बाद छापी गई । सावरकर कांग्रेस की दृष्टि में इसलिए खलनायक है क्योंकि उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवाद को जन्म दिया था .. जबकि कांग्रेस को मुस्लिम राष्ट्रवाद पसंद था। इतना ही नहीं जब भारत छोड़ो आन्दोलन अपने चरम पर था, लोग अंग्रेजों के खिलाफ संगठित होकर विद्रोह करने लगे थे .. तब अचानक गाँधी ने चौरी-चौरा कांड का बहाना बनाकर आन्दोलन को वापस क्यों ले लिया और तो और नेताजी सुभाषचंद्र बोस नें जब सशस्त्र हमला किया अंग्रेजों के ऊपर तब गाँधी ने लोगों को नेताजी के आंदोलन में शामिल न होने के लिए अपील क्यों किया और उस समय नेहरू जी का वक्तव्य था कि यदि सुभाष चंद बोस यदि भारत की धरती पर कदम रखे तो मैं तलवार लेकर उन पर सबसे पहले हमला करूँगा ???
आगे कांग्रेस पर डॉ0 राय नें करारा प्रहार करते हुए कहा कि मोहन दास करमचंद गाँधी सरदार भगत सिंह के परोक्ष रूप से हंता (हत्यारे) थे क्योंकि अहिंसा नीति के पोषक गाँधी जी नें अमर हुतात्मा सरदार भगतसिंह के फांसी वाले मामले पर कहा था, ‘‘हमें ब्रिटेन के विनाश के बदले अपनी आजादी नहीं चाहिए ’’ और आगे कहा, ‘‘भगतसिंह की पूजा से देश को बहुत हानि हुई और हो रही है, फाँसी शीघ्र दे दी जाए ताकि 30 मार्च से करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में कोई बाधा न आवे।”
डॉ0 राय नें मोहनदास करम चंद गाँधी पर मुस्लिम कट्टरवाद का बढ़ावा देनें का आरोप लगाते हुए कहा कि मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। वहीं केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं से मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दू मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गाँधी जी नें इस हिंसा का विरोध नहीं किया वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया जो अत्यंत निंदनीय कृत्य था । इतना ही नहीं देश का बँटवारा कराने वाले को मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
हिन्दू महासभा के वरिष्ठ नेता डॉ0 राय नें आगे कहा कि गाँधी नें भारत माता के वीर सपूतों का भी घोर अपमान किया, उन्होंने अनेंक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।
फिल्म निर्माता डॉ0 संतोष राय को देश के विभाजन के लिए प्रमुख रूप से गाँधी को जिम्मेदार बताते हुए कहा कि 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा। फिर भी देश का विभाजन करने वाले को इस देश के वासी राष्ट्रपिता कहते हैं, इससे बड़ा देश का दुर्भाग्य क्या हो सकता है ? इतना ही नहीं गाँधी नें गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने का पूरजोर विरोध किया ।
हिन्दू महासभा के वरिष्ठ नेता श्री संतोष राय नें गाँधी के अहिंसा को ढोंग बताते हुए कहा कि 1939 के द्वितीय विश्व युद्ध में गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन के लिए हथियार उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया जबकि वो हमेंशा अहिंसा की पीपनी बजाते रहते थे वहीं गाँधी और नेहरू दोनों पेशे से वकील थे तो क्या भगत सिंह जी का मुकदमा नहीं लड़ सकते थे । इनकी नजरों में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा भगत सिंह को फाँसी देना हिंसा नहीं थी ।
डॉ0 राय नें गाँधी को देश के बँटवारे के लिए जिम्मेदार बताते हुए कहा कि देश को बँटवारे में गाँधी नें मुस्लिमों को उकसाया । धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत के जरिये गाँधी जी का यही मुस्लिम तुष्टिकरण देश के विभाजन का भी कारण बना, जब २६ मार्च १९४० को जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की अवधारणा पर जोर दिया तब गाँधी जी का वक्तव्य था – अन्य नागरिकों की तरह मुस्लिम को भी यह निर्धारण करने का अधिकार है कि वो अलग रह सके, हम एक संयुक्त परिवार में रह रहे हैं ( हरिजन , ६ अप्रैल १९४० ) इतना ही नहीं अगर इस देश के अधिकांश मुस्लिम यह सोचते हैं कि एक अलग देश जरूरी है और उनका हिंदुओं से कोई समानता नहीं है तो दुनिया की कोई ताक़त उनके विचार नहीं बदल सकती और इस कारण वो नए देश की मांग रखते है तो वो मानना चाहिए, हिन्दू इसका विरोध कर सकते है ( हरिजन , १८ अप्रैल १९४२ )।