Monday, April 11, 2016

केजरीवाल के बाथरूम में भी लगे है AC जानिए कैसे हो रही जनता के पैसे की बर्बादी

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सरकारी आवास के लिए बिजली बिल जून के महीने में 1.35 लाख रुपये आये हैं  जिसका की कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों ने जमकर विरोध किया है | बीजेपी का कहना है की व्यक्तिगत सुख के लिए जनता के पैसे बर्बाद कर रही है केजरीवाल सरकार|
कुल बिल सिविल लाइंस में फ्लैग स्टाफ रोड पर 6 पर केजरीवाल के आवास पर दो मीटर के जरिए लिए गए कनेक्शन पर आया है |

एक बिल 22,689 रुपए का है, जबकि दूसरे बिल में उद्धृत राशि Rs1,13,598 थी।
एक आरटीआई आवेदन के जवाब में दिल्ली सरकार ने पिछले महीने कहा था कि पिछले वर्ष अप्रैल और मई के लिए केजरीवाल के आवास पर बिजली शुल्क 91,000 रुपये था।
दिल्ली सरकार ने इसे विभिन्न अन्य सुविधाओं के लिए परिसर में आगंतुकों के लिए स्थापित एक शिविर कार्यालय के लिए  शामिल बिजली शुल्क कहा था।


यह कहा गया  की मुख्यमंत्री निवास पर बिजली की खपत के लिए वास्तविक बिल काफी कम था। सूत्रों ने कहा कि केजरीवाल के आवास पर  एयर कूलर की एक संख्या के अलावा 30 से अधिक एयर कंडीशनर है। यहाँ तक की केजरीवाल के बाथरूम में भी AC की व्यवस्था है |
इस बीच, सूत्रों ने बताया कि एक वितरण कंपनी है जो सिविल लाइंस इलाके में बिजली की आपूर्ति करती है एवं  यह कार्यालय के काम के लिए घरेलू कनेक्शन का उपयोग करने के लिए मुख्यमंत्री के निवास के लिए एक नोटिस भेज सकते हैं।
डीपीसीसी अध्यक्ष अजय माकन ने पूछा। “अरविंद केजरीवाल  निजी इस्तेमाल के लिए सार्वजनिक कोष बर्बाद कर रहे है। आप नेताओं ने कहा था कि वे विलासिता में लिप्त नहीं होंगे और एक आम आदमी की तरह जीना होगा। अब वे क्या कर रहे हैं, ”
भाजपा नेता विजेंद्र गुप्ता ने भी  केजरीवाल सरकार पर यह आरोप लगते हुए की सरकार व्यक्तिगत सुख के लिए सार्वजनिक धन बर्बाद कर रही है कहा,
“यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। वे व्यक्तिगत सुख के लिए सार्वजनिक धन बर्बाद कर रहे है । दिल्ली के लोग अब आम आदमी पार्टी के असली चेहरे के बारे में जान चुके है  ”

Sunday, April 10, 2016

बंद दुकानों के अंदर चल रहा सर्राफा कारोबारियों का आभूषण निर्माण कार्य

सर्राफा प्रदेश यूनियन के निर्देशों के बावजूद श्रीनगर गढ़वाल में दो दिनों तक अपनी दुकानें खोलकर जमके माल बेचने वाले सर्राफा कारोबारियों ने आखिरकार यूनियन के दबाव में अपनी दुकानें एक बार फिर बंद कर ली हैं.

हालांकि सर्राफा कारोबारियों ने दिखावे के लिए तो दुकानें बंद की हुई हैं, लेकिन दुकानों के अंदर ग्राहकों की डिमांड पर गहने बनाए जा रहे हैं. फोटो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे सर्राफा कारोबारी प्रदेश यूनियन के आदेशों को ताक पर रख अपने कारीगरों से गहनों का निर्माण कार्य करवा रहे हैं.
दरअसल, पिछले एक माह से अधिक के समय से सोने-चांदी पर केंद्र सरकार द्वारा लगाए गई एक्साइज ड्यूटी के खिलाफ सर्राफा व्यापारी पूरे प्रदेश में अपनी दुकानों को बंद किए हुए हैं. लंबे समय से दुकानें बंद होने और कार्यरत मजदूरों के वेतन देने से सर्राफा कारोबारियों की बिगड़ती आर्थिक स्थिति से वे दबाव में हैं.
शादियों और अन्य समारोहों के लिए गहनों की मांग और ग्राहकों की जिद व गुस्से के साथ यूनियन का दबाव भी सर्राफा कारोबारियों के लिए मुसीबत बन गया है. यही कारण है कि इन सब चीजों में तालमेल बनाते हुए कई सर्राफा कारोबारी चुपचाप ग्राहकों की मांग पर गहनों के निर्माण का सौदा कर बंद दुकानों के बावजूद व्यवसाय जारी रखे हुए हैं.
पिछले एक माह से नगर में दुकानें बंद किए होने से परेशान सर्राफा कारोबारियों ने दो दिन पूर्व दुकानें खोल ली थी, लेकिन अचानक प्रदेश यूनियन की डांट के दबाव में आखिरकार दो दिन बाद ही उन्हें अपनी दुकानें बंद करनी पड़ी. हालांकि छोटे सर्राफा कारोबारी तो दुकानें खोलना चाहते हैं, लेकिन बड़े कारोबारियों के डर से मजबूरी में वे अपनी दुकानें बंद किए हुए हैं.
नगर सर्राफा यूनियन के अध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह चौहान का कहना है कि प्रदेश यूनियन से तालमेल बिगड़ने के चलते नगर की सर्राफा दुकानें खुली थीं, लेकिन यूनियन के मिले नए आदेशों के बाद फिर से दुकानें बंद कर दी गई हैं. उनका कहना है कि जब तक केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी खत्म नहीं करती तब तक उनकी दुकानें बंद रहेंगी.

जब बंद सर्राफा दुकानों के अंदर आभूषण निर्माण कार्य के बारे में उनसे पूछा गया तो उनका कहना है कि अगर किसी ग्राहक के दबाव में कोई एक कारीगर काम कर रहा होगा तो उसकी उन्हें जानकारी नहीं है. उनका कहना है कि केंद्र सरकार के अड़ियल रवैये से नुकसान कारोबारियों का भी हो रहा है और ग्राहकों का भी.

Saturday, April 9, 2016

."डर" एक बहुत कॉमन सी चीज़ है जो हम सबमे पायी जाती है

......"डर" एक बहुत कॉमन सी चीज़ है जो हम सबमे पायी जाती है....डरता हर कोई है पर.....मानता कोई नहीं....इसे स्वीकार कोई नही करना चाहता....और यहीं समस्या शुरू होती है....कोई ऐसा काम जो आप करने में डरते हैं, तो कोई बात नहीं....होता है, नार्मल है....पर....आप नहीं कर सकते तो इसे मानिए.....आपकी ये स्वीकार्यता किसी दुसरे को ये काम करने में मदद दे सकती है.....प्लासी की लड़ाई में क्लाइव के पास केवल 950 अंग्रेज सिपाही, 150 बंदूकची, 2100 भारतीय सिपाही थे.....मतलब टोटल केवल 3200 लड़ाके.....और वो भी नियमित सेना नहीं....उनमे से अधिकाँश एक व्यापार करने वाली कंपनी के व्यापारी, नौकर, क्लर्क, गुमाश्ते आदि थे.....उनका लीडर क्लाइव कभी इंग्लैण्ड की सड़कों पर आवारा घूमता था....दूसरी तरफ...सिराज़ुद्दौला के पास 50,000 "नियमित" सिपाहियों की फौज थी.....खैर ये युद्ध क्लाइव जीता और इसमें सिराजुद्दौला की सेना में कुछ महत्वपूर्ण लोगों ने गद्दारी की.....असल बात आती है इसके बाद की.....क्लाइव जीत के बाद मुर्शिदाबाद में घुसा.....तब उसके पीछे सिर्फ 200 यूरोपियन और 500 भारतीय सिपाही थे.....क्लाइव को शहर में घुसने से डर लग रहा था.....वो खुद लिखता है ....."उस वक्त शहर के रहने वाले हमें देख रहेथे, जो कई हज़ार थे....यदि वो चाहते तो वे हम सबको केवल पत्थरों और लाठियों से भी मार डाल सकते थे"....पर ऐसा करता कौन?....बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ?......उनका उस समय कोई लीडर नहीं था....और उनमे डर बैठा था...वो हारी हुई जनता से थे....अगर लीडर होता तो शायद जोश दिलाने पर कुछ करते....हमें हमेशा एक लीडर चाहिए...अच्छा या खराब फर्क नहीं पड़ता....हम डरते हैं....अपनी ज़िम्मेदारी लीडर पर थोपते हैं.....तो कम से कम इसे स्वीकार करो और किसी को लीडर चुनो जो कहता है मैं ये काम करूँगा और कर भी रहा है.....आप मान जाओ कि आप ये नहीं कर सकते.....मत बोलो कि कुछ दिन बाद आप खुद ये कर सकते हो....अभी समय नहीं है....अभी परिस्थिति अनुकूल नहीं है.....झूठ मत बोलो....जो आगे बढ़ रहा है कम से कम उसे समर्थन दो.....खुलकर कहो कि हम डरते हैं.....और जो नहीं डर रहा है .....कम से कम उसे "मौखिक" समर्थन दे सकते हो..... Satyam Kumar और उनके NIT के साथियों को कम से कम हतोत्साहित ना करो....ये नेता नहीं बनना चाहते....पर हमें लीडर चाहिए.....नहीं तो मुर्शिदाबाद में क्लाइव घुसता ही रहेगा....भले ही अन्दर से डरा हुआ.....