Friday, April 8, 2016

श्रीनगर NIT और पठानकोट हमले पर मोदी का मास्‍टर स्‍ट्रोक, पाक की उड़ी नींद, विदेशनीति का ऐतिहासिक कदम..!

नरेंद्र मोदी ने जीवन में कई ऐसे मौके पाए होंगे, जब लोगों ने हर तरफ तारीफ ही की होगी, लेकिन इस समय एक मौका ऐसा आया है, जब उनके कई चाहने वाले भी या तो उनकी बुराई कर रहे हैं या फिर आलोचना कर रहे हैं। लेकिन मेरा मानना जरा अलग है। आप सहमत हो सकते हैं या विरोध कर सकते हैं, लेकिन तर्क जरूरी है।

1.    पहला मुद्दा जिस पर मोदी की सबसे ज्यादा आलोचना हो रही है, वो है कि उनकी ही पार्टी के राज में श्रीनगर में NIT में देशभक्तों पर लाठी बरस रही है, या बरसी है और सरकार ने कुछ नहीं किया।
2.   आलोचना का दूसरा बड़ा मुद्दा ये बनाया जा रहा है कि मोदी जी के राज में पाकिस्तान ने सबसे ज्यादा इस देश की किरकिरी की है। पहले अपने अधिकारियों के साथ हमारे देश में खोजबीन के बहाने घुस आए और अब अपने देश में पहुंचते ही फिर से भारत को आंख दिखा रहे हैं, इसे विदेश नीति में अब तक की सबसे बड़ी विफलता बताने की कोशिश 

दोनों मुद्दों पर मेरी सोच जरा अलग है। सबसे पहले आपको श्रीनगर में NIT के बारे में बताता हूं। अब तक मैंने कई स्टूडेंट्स या फिर यहां कवरेज से जुड़े लोगों से बात की है। इस बातचीत से कुछ बातें बहुत ही साफ हैं। NIT श्रीनगर में छात्र-छात्राओं के बीच दहशत का माहौल है औऱ ये 1-2 हफ्ते से है, ऐसा नहीं है। बल्कि ये सालों से है। खुद वहां के छात्र बता रहे हैं कि पहले के सीनियर के साथ औऱ भी ज्यादती की गई है।
दूसरा NIT श्रीनगर में सुरक्षा की जिम्मेदारी जम्मू-कश्मीर पुलिस की है, जिस पर भी राज्य के बाहर के लोग भेदभाव के आरोप लगा रहे हैं। तीसरा जम्मू-कश्मीर में हमेशा या तो क्षेत्रीय दलों या फिर मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाने वाली कांग्रेस का कब्जा रहा है। जाहिर तौर पर स्टूडेंट्स के साथ ज्यादती तो पहले भी हुई हैं, लेकिन खबरें कभी बाहर ही नहीं आईं। लेकिन ये पहला मौका है कि NIT श्रीनगर की तस्वीर अब पूरी दुनिया देख रही है। ये सब अगर संभव हो पाया है, तो मेरे ख्याल में इसकी वजह सिर्फ ये है कि इस बार सरकार कुछ छिपाना नहीं चाहती, बल्कि सच को सबके सामने उजागर होने देना चाहती है, ताकि लोगों को हकीकत पता चल सके।
हैरानी तो इस बात की है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी स्टूडेंट्स में इतनी दहशत है कि वो बात तो कर रहे हैं, लेकिन कोई चेहरा या नाम उजागर नहीं करना चाहता। हालात को देखते हुए पहली बार NIT श्रीनगर को सीआरपीएफ ने कब्जे में लिया है, यानी की सेंट्रल फोर्सेस को अंदर भेजा गया है। क्या कभी दूसरी सरकारों ने ऐसी हिम्मत दिखाई है।

 यकीनन ऐसे में आप मोदी सरकार या फिर जम्मू-कश्मीर में सत्ता में साझेदार बीजेपी की सरकार की आलोचना करने के बजाए दाद देनी चाहिए कि उन्होंने न सिर्फ छात्रों के बीच हिम्मत पैदा की, बल्कि कश्मीर में मौजूद इस संस्थान की असलियत से लोगों का वाकिफ कराया। अब जब परेशानी सामने दिख रही है, तो जाहिर है उनको इसका समाधान भी ढूंढना पड़ेगा।
आलोचना का दूसरा विषय है पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार की नीति। जिस तरीके से पाकिस्तान की JIT ने भारत में आकर जांच की और पाकिस्तान लौटते ही भारत पर सवाल उठाने लगे, उसके बाद मोदी के समर्थक ही सरकार पर सवाल उठाने लगे हैं। लेकिन सच तो ये है कि इस जांच के बाद मोदी सरकार को शाबाशी देनी चाहिए।
दरअसल, अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का कई सिरा होता है, आपकी एक कार्रवाई के कई आयाम होते हैं और कई नजरिए से आप इसे पेश कर सकते हैं। भारत-पाकिस्तान का संबंध भले ही अब तक भारत चीख-चीखकर कहता रहा कि ये द्विपक्षीय है, लेकिन पाकिस्तान इसे बहुपक्षीय बनाने में ही लगा रहा।
इस बार मोदी ने मास्टर स्ट्रोक खेला है। जांच तो द्विपक्षीय बनाई, लेकिन मामले को बहुपक्षीय बना दिया। पूरी दुनिया ने देखा कि किस तरीके से आतंक के मामले में भारत ने पाकिस्तान को सबूत दिया, उसकी टीम को यहां आने की इजाजत दी, लेकिन बदले में पाकिस्तान ने कोई सहयोग नहीं किया। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की दरअसल कलई खुल गई है।
दूसरा पाकिस्तान की टीम ने अगर भारत में जांच ही कर ली, तो इससे सामरिक दृष्टि से भारत को क्या नुकसान हो गया। क्या पाकिस्तान ने आकर कोई ऐसा गुप्त ठिकाना देख लिया, जिससे सुरक्षा को लेकर खतरा है, क्या उसने हमें आंख दिखाकर हमें हरा दिया या फिर हमारी जमीन छीन ली।
सच तो ये है कि खुद ये टीम बता रही है कि इन्होंने सेना के लोगों से न तो मिलाया और न ही ठिकाने में कुछ खास दिखाया, बल्कि जो भारत की सुरक्षा एजेंसी को जरूरत लगी, वहीं तक उन्हें भेजा। लेकिन दुनिया भर में ये मैसेज गया कि कैसे पाकिस्तान की नीयत आतंक को लेकर सही नहीं है।
तीसरी बात ये है कि मोदी हमेशा आउट ऑफ द बॉक्स सोचने वाले नेता हैं। अब तक हम यही सोचते आए हैं कि पाकिस्तान बदलने वाला नहीं है, लेकिन अगर हम पारंपरिक तरीके से ही चीजों को सोचेंगे तो कुछ नया और खास नहीं होगा। जिस तरीके से मोदी ने पाकिस्तानी टीम को आने की इजाजत दी और बदले में अगर पाकिस्तान में जरा सी भी समझ पैदा हुई होती कि आतंक के मामले में उसे भी भारत का सहयोग करना है, तो जरा सोचिए कितना बड़ा बदलाव आ जाता। मोदी की हिम्मत की दाद देनी चाहिए कि उन्होंने पाकिस्तान टीम को आने देने के लए कितना बड़ा फैसला किया।

 साफ है इन दोनों मुद्दों पर जो भी मोदी की आलोचना कर रहे हैं, अगर वो चीजों को अलग ढंग और नजरिए से देखने की कोशिश करेंगे, तो ये एक बड़ा फैसला नजर आएगा। ऐसे में मोदी की आलोचना करने की बजाए इस सरकार को इस बात की शाबाशी देनी चाहिए कि उनका एप्रोच पॉजिटिव है और वो अपनी कमियों को लेकर घबराते या बचने की कोशिश नहीं करते हैं, बल्कि उनको सामने रखकर उसका सामना करने की कोशिश करते हैं। कमियों को छिपाना आसान है, लेकिन कमियों को उजागर कर उसका सामना करने की हिम्मत मोदी सरकार दिखा रही है।

Thursday, April 7, 2016

कोई भी अयोग्य नहीं है


कोई भी अयोग्य नहीं है। अस्तित्व अयोग्य लोगों का उत्पादन नहीं करता है। अस्तित्व मूर्ख नहीं है। अगर अस्तित्व इतने सारे अयोग्य लोगों का उत्पादन करता है, तो पूरी जिम्मेवारी अस्तित्व को जाती है। तो यह निश्चित रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अस्तित्व बुद्धिमान नहीं है, कि इसके पीछे कोई बुद्धि नहीं है, कि यह एक मूर्ख, भौतिकवादी, आकस्मिक घटना है और इसमें कोई चेतना नहीं है। यह हमारी पूरी लड़ाई है, हमारा पूरा संघर्ष है: यह साबित करना कि अस्तित्व बुद्धिमान है, कि अस्तित्व बेहद सचेत है। यह वही अस्तित्व है जो गौतम बुद्ध बनाता है, वह अयोग्य लोगों को नहीं बना सकता। तुम अयोग्य नहीं हो। तो कोई द्वार खोजने का सवाल ही नहीं है, केवल एक समझ चाहिए कि अयोग्यता एक झूठी धारणा है जो तुमपर उनके द्वारा आरोपित की गई है जो तुम्हें पूरे जीवन के लिए गुलाम बनाना चाहते हैं। तुम इसे बस अभी छोड़ सकते हो।

अस्तित्व तुम्हें वही सूरज देता है जो गौतम बुद्ध को, वही चांद देता है जो जरथुस्त्र को, वही हवा जो महावीर को, वही बारिश जो जीसस को। कोई फर्क नहीं पड़ता, कोई भेद-भाव की जानकारी नहीं है। अस्तित्व के लिए, गौतम बुद्ध, जरथुस्त्र, लाओत्सु, बोधिधर्म, कबीर, नानक या तुम सब एक ही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि गौतम बुद्ध ने अयोग्य होने के विचार को स्वीकार नहीं किया है, वह विचार खारिज कर दिया।

तो अयोग्यता का विचार छोड़ दो, यह एक विचार है। और इसे छोड़ने के साथ, तुम आकाश के नीचे हो। द्वार का कोई सवाल नहीं है, सब कुछ खुला है, सभी दिशाएं खुली हैं। कि तुम हो, यह पर्याप्त है साबित करने के लिए कि अस्तित्व को तुम्हारी जरूरत है, वह तुमसे प्यार करता है, तुम्हारा पोषण करता है, तुम्हारा सम्मान करता है।

अयोग्यता के विचार को सामाजिक परजीवी द्वारा बनाया गया है। इस विचार को गिरा दो। अस्तित्व के लिए आभारी होओ…क्योंकि यह केवल योग्य लोगों को बनाता है, यह कभी उसे नहीं बनाता जो बेकार है। यह केवल उन्हीं लोगों को बनाता है जिनकी जरूरत है। मेरा जोर है कि हर संन्यासी अपना सम्मान करे और अस्तित्व के प्रति आभारी महसूस करे कि वह समय और स्थान के इस अवसर पर यहां है।

Wednesday, April 6, 2016

युद्धाय कृत निश्चयः

सभ्य समाज एक दिन में इस स्थिति में नहीं आया. सैकड़ों वर्षों के विकास के कारण समाज इस स्थिति में पहुंचा है कि उसे सभ्य कहा जा सकता है। आपसी सौहार्द के नियमों में लगातार कांट-छांट और बढ़ोत्तरी, प्रत्येक जीवन को समान महत्व देने के नियम, स्त्रियों के समान अधिकार, व्यक्ति या समूह के विशेषाधिकारों का निषेध, प्रजातंत्र और प्रत्येक व्यक्ति के वोट का समान महत्व जैसी अनेक बातों का अनुसरण करते-करते यानी जीवन शैली में लगातार परिवर्तन करते-करते समाज ऐसी स्थिति में पहुंचा है जिसे अपेक्षाकृत सभ्य कहा जा सकता है। ये बातें परंपरागत भी हैं और वर्तमान काल में तय की हुई भी। इन्हें विशेषकर इस कारण लिखित रूप दिया गया है कोई भी इनकी मनमानी अवहेलना न कर सके।
फिर भी सभ्य समाज को पीड़ा देने वाले व्यक्ति और समूह मिल ही जाते हैं। इसी कारण इन्हें असामाजिक तत्व कहा जाता है। इनकी असभ्यता की रोकथाम के दंड-विधान की व्यवस्था है। कभी-कभी ये आचरण इतने बुरे होते हैं समाज मृत्यु-दंड की व्यवस्था करता है मगर ये दंड मनमर्ज़ी पर नहीं होता. इसके लिये विभिन्न चरणों की सजग न्याय-प्रणाली होती है। मृत्यु-दंड भी बिरले ही दिया जाता है। अब तो विभिन्न देशों में मृत्यु-दंड पर रोक लगायी जा चुकी है। इसका तर्क ये है कि मनुष्य को जीवन का मौलिक अधिकार है और ये अधिकार बुरे से बुरे मनुष्य से भी नहीं छीना जा सकता। अधिकतम उस व्यक्ति को उसकी अंतिम साँस तक जेल में बंद कर समाज से दूर रक्खा जा सकता है। ये सर्वमान्य और सर्वस्वीकृत तथ्य हैं। सभ्य समाज की इस स्थिति के बावजूद आइये अपनी जानकारी में कुछ बढ़ोत्तरी की जाये।
ईराक में एक अल्पसंख्यक समूह है। जिसे वहां यजदी पुकारा जाता है। यजदी समाज मूलतः कुर्द है बल्कि कुर्द मूलतः यजदी हैं। ये लोग उस क्षेत्र के सबसे पुराने निवासी हैं और पारसी, ईसाई और इस्लाम के संक्षिप्त रिवाजों को मानते हैं। उनके अनुसार ये रिवाज मूलतः उनके हैं जिन्हें दूसरे समाजों ने अपना लिया है। ये ईसाईयों की तरह बपतिस्मा करते हैं, यहूदियों-मुसलमानों की तरह ख़तना करते हैं और पारसियों की तरह अग्नि को पूज्य मानते हैं। इन सब बातों के बाद भी ये अपनी जड़ें अरबी नहीं मानते। ये मलक ताऊस अर्थात मोर फ़रिश्ते को भी पवित्र मानते हैं। इस समाज के पीछे इन दिनों आई एस आई एस के आतंकवादी पड़े हुए हैं और औरतों बच्चों सहित 50,000 लोगों को क़त्ल कर चुके हैं। इस समाज के लोगों की सामूहिक क़ब्रें मिलीं हैं। इन क़ब्रों में यजदी लोगों को जीवित ही दफ़ना दिया गया।
ये दंड मुस्लिम सत्ता के काल में भारत में भी दिया जाता था। दसवीं पादशाही गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के 2 साहबज़ादों को दीवार में चुन कर मार डाले जाने का प्रसंग प्रत्यक्ष है। ऐसा नहीं है कि ये हत्या कांड अभी ही हो रहे हैं। 18वीं, 19वीं शताब्दी में तुर्की ख़िलाफ़त के काल में { जिसे प्रथम विश्व युद्ध में ख़त्म कर दिया गया था और इसे वापस लाने के लिए कांग्रेस और गांधी जी ने भी ज़ोर लगाया था } भी इनका 72 बार नरसंहार हुआ था। अब ये 6 लाख से भी कम रह गये हैं। इन्हीं लोगों को आई एस आई एस के गुंडे मार धमका कर उस देश से जो मूलतः इनका ही है, भगा देना चाहते हैं। यही इस्लामी आतंकवादियों ने कश्मीर में किया था। यही बंगाल और असम के बांग्ला देश से लगते सीमावर्ती क्षेत्रों में हो रहा है। सभ्य समाज इस स्थिति पर इन परिस्थितियों पर मौन है।
ख़ामोशी या निस्तब्धता केवल कह पाने कि असमर्थता ही नहीं होती। सच के पक्ष में हाथ उठाने में भय की अनुभूति, समाज की नसों में शताब्दियों से प्रसारित और व्याप्त डर भी ख़ामोश कर देता है। अन्यथा कोई कारण नहीं कि ईराक़ के इन हत्याकांडों पर भारतीय प्रेस और राजनैतिक दल मौन रहें। इसी तरह अंग्रेज़ी प्रेस तो पीड़ितों के पक्ष को थोड़ा समझने का प्रयास कर भी रहा है मगर हिंदी मीडिया को तो सांप सूंघ गया है। इतिहास के कूड़ेदान में फेंके जा चुके वामपंथी और तालिबानी मानसिकता वाले लोग हमेशा की तरह इस्लामी आतंकवादियों और आई एस आई एस के पक्ष में बोल रहे हैं।
सामान्य घरेलू तथा पड़ौस के झगड़े भी इस तरह शांत नहीं होते और इस विषय में तो आक्रामक स्वयं को मनमाने तर्क से सही और दूसरे को ग़लत ठहरा रहे हैं। क्या मुझे अधिकार है कि मैं किसी के एकेश्वरवाद को गलत ठहराऊं ? यदि नहीं तो आप मेरी उपासना पद्यति की आलोचना करने वाले और मुझे वाजिबुल-क़त्ल ठहरने वाले कौन हैं। हम सबके जीवन में कुछ न कुछ ऐसा मिल जायेगा जो दूसरे की दृष्टि में गलत होगा। तो क्या सभ्य संसार ऐसी हत्यारी सोच को केवल इस लिए सहता रहेगा कि वो किसी की निजी उपासना पद्यति का हिस्सा है ?
यदि ये मौन रहने की जगह है तो सभ्य समाज ने नरमांस-भक्षण करने वाले समूहों को क्यों नष्ट कर दिया ? उनकी सोच में और इस सोच में केवल मांस खाने का ही तो अंतर है अन्यथा मनुष्य की हत्या तो उससे भी कहीं अधिक अर्थात समूह की, की जा रही है। नरमांसभक्षी तो केवल खाने के लिये मारते थे यहाँ तो इन हत्याकांडों के धर्म ग्रन्थ में तर्क भी ढूंढे जाते हैं। ये कैसी आस्था-प्रणाली है जो अपने कुढब मापदंडों पर संसार को जांचती है, आंकती है और फिर उसे हांकती है। उसकी आस्थाएं तार्किक हैं या विचित्र... उसके मापदंड सभ्य हैं या जंगली.... उसे इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता। चलिए ऐसा ही सही चूँकि हर उत्पाती के पास अपने उत्पात को सही ठहरने के लिये तर्क होते हैं मगर सभ्य समाज जो इससे प्रभावित है उसे क्या हो गया है ?
इतिहास के विद्यार्थियों को ध्यान होगा माओ ने एक समय स्टालिन को एक बर्बर सलाह दी थी कि रूस को अमरीका पर हमला कर देना चाहिए। उसके पीछे उसकी सोच थी कि चीनी लोग विश्व की सबसे बड़ी जनसँख्या हैं। युद्ध के उपरांत जितने भी लोग बचेंगे उनमें चीनी लोगों का बाहुल्य होगा, अतः युद्ध के बाद संसार पर चीनी मूल के लोगों का शासन हो जायेगा। अब यही सोच सऊदी अरब के वहाबी शासकों और उनसे पैसा पाने वाले अल क़ायदा, बोको हराम, लश्करे-तय्यबा, आई एस आई एस, हमास जैसे संगठनों की है। तार्किक रूप से इस सोच को पराजित करने के साथ-साथ इनका बीज मात्र नष्ट करने के अतिरिक्त सभ्य समाज के पास और कोई विकल्प नहीं है।
हत्वा वा प्राप्यसे स्वर्गं जित्वा वा भोक्षसे महीम
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चयः { भगवद-गीता }